>>

Patrika - A Hindi news portal brings latest news, headlines in hindi from India, world, business, politics, sports and entertainment!

कोटा. शहर में युवाओं को मानसिक बीमारी घेर रही है। अफेयर के बाद ब्रेकअप, परीक्षा में फेल या कम अंक आना, उन्नति नहीं मिलना, प्रतिस्पर्धा में पिछड़ना, नशे की लत, परिवार में झगड़े, संवेदनशील दोस्तों का अभाव, सोश्यल मीडिया पर अटेंशन की चाह जैसे कारण मुख्य है। इसके साथ कम आय और खर्च ज्यादा होना, स्टेटस सिंबल के पीछे भागना, पारिवारिक तनाव, आर्थिक संकट भी बड़ा कारण है।

मेडिकल कॉलेज अस्पताल के मानसिक रोग विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक रूप से स्वस्थ रहना आवश्यक है। मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग की ओपीडी में पहुंचने के वाले मरीजों में से 18 से लेकर 40 तक आयु वर्ग के लोगों की संख्या ज्यादा है। शहर में दस में एक युवा को कोई न कोई मानसिक समस्या या नशे की लत का शिकार है।

यह भी पढ़े: https://www.patrika.com/kota-news/booking-of-oxyzone-can-be-done-from-country-by-qr-code-8275164/

व्यवहार में बदलाव पर रखें नजर

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर परिवार के सदस्य, मित्र, सहपाठी, सहकर्मी किसी में अचानक बदलाव आता है, जैसे गुमसुम रहना, चिड़चिड़ापन, अकेलापन, घबराहट, सिरदर्द, भूख में कमी, काम में मन नहीं लगना, गललियां बढ़ना, तो उस पर नजर रखना आवश्यक है। ऐसे में उसे मनोचिकित्सक के पास ले जाना चाहिए। जिससे काउंसलिंग, दवाइयों के माध्यम से उसका इलाज हो सके। मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक रोगियों के लिए दवाओं से अधिक उचित परामर्श जरूरी होता है। युवा वर्ग में मानसिक बीमारियों को बढ़ना चिंता का विषय है।

मानसिक बीमार के लक्षण

ओसीडी: इस बीमारी का पूरा नाम ओबसेसिव कंपल्सिव डिसार्डर है। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति साफ-सफाई की ओर ध्यान देने लगता है। बार-बार हाथ धोना, बार-बार यह देखना कि दरवाजे बंद है या नहीं और बार-बार टायलेट जाना इस बीमारी के मुख्य लक्षण हैं।

यह भी पढ़े: https://www.patrika.com/kota-news/teenager-raped-accused-sentenced-to-life-imprisonment-8275491/

साइकोसिस: पीड़ित व्यक्ति को पूरी तरह वास्तविक दुनिया से दूर हो जाता है। उसे शक, वहम होने लगते है, अनजान आवाजे सुनने लगती है। वह अकेले इशोर और बाते करने लगता है। परिवार परिजन समाज किसी की भी चिंता नहीं रहती है।अवसाद: इससे पीड़ित व्यक्ति को किसी से भी बातचीत नहीं करना अच्छा नहीं लगता, अकेलेपन में रहना पसंद करता है। स्वयं को किसी कार्य या जिम्मेदार के लिए उपयुक्त नहीं मानने लगता है। स्वयं को खत्म कर लेने की सोचने लगता है।

एंग्जायटी: यह बेवजह या अत्यधिक चिंता का व्यवहार है। कहीं भी मन नहीं लगता, घबराहट होती है, नींद और भूख में कमी, सिर दर्द, एकाग्रता में कमी, चीजें समय पर याद नहीं आना आदि। धीरे-धीरे व्यक्ति हर समय बेचैन रहने लगता है। बार-बार दिल की धड़कन बढ़ने, पेट में गैस बनने, बार-बार टॉयलेट करने की शिकायत करता है। किसी में बेहोशी जैसे दौरे पड़ने लगते है।

मैनिक डिप्रेसिव मूड डिसऑर्डर

पीड़ित व्यक्ति कभी बहुत ज्यादा खुश रहने लगता है। ऊंची-ऊंची बातें करने लगता है और कभी इसके विपरीत उदास रहने लगता है। पीडि़त व्यक्ति को नींद की जरूरत कम हो जाती है।

नशे की लगत: जब रोगी मानसिक परेशानी का इलाज नहीं लेकर गलत हल ढूढ़ता है तब नशे को अपना लेता है और फिर धीरे धीरे लत का शिकार हो जाता है। स्मैक या चरस के शिकार नशे के लिए आए दिन छोटी-छोटी चोरी करते है और अपराध में लिप्त हो जाते है। ऐसे रोगी कोटा में प्रशासन, पुलिस और समाज के लिए बहुत बड़ी परेशानी बने हुए है। ऐसे रोगियों को परिवार, परिजन, बच्चों और समाज का ख्याल नहीं रहता है।

इनका यह कहना है

युवा मानसिक रोगियों के मामले सामने आ रहे हैं। बीमारी की शुरुआती स्थिति में काउंसलिंग से आराम मिल जाता है, लेकिन गंभीर होने पर काउंसलिंग के साथ दवाइयां लंबे समय तक लेनी पड़ती है।

- डॉ. विनोद दडि़या, नोडल ऑफिसर, जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, कोटा

150-200 मरीज औसतन प्रतिदिन आते है मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में

30-40 प्रतिशत युवा शामिल

20 से 25 प्रतिशत युवा कॅरियर फॉल, प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने, नौकरी, आर्थिक नुकसान, ब्रेकअप से परेशान

10 से 15 प्रतिशत नशे की लत, वर्तमान में गोगा के रूप में ज्यादा प्रचलित है।

You received this email because you set up a subscription at Feedrabbit. This email was sent to you at abhijeet990099@gmail.com. Unsubscribe or change your subscription.