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धरोहरों के संरक्षण के लिए आखिर जिम्मेदार कौन Saturday 06 January 2024 04:18 AM UTC+00 कुलधरा में प्राचीन पालीवाल सभ्यता की निशानी के तौर पर एक खंडहरनुमा मकान की दीवार को एक युवक की ओर से रील बनाने के लिए तोड़े जाने का मामला सुर्खियों में आने के बीच एक बार फिर सैकड़ों साल प्राचीन जैसलमेर और इसके ग्रामीण क्षेत्रों में अवस्थित प्राचीन धरोहरों के संरक्षण का मसला उभर कर सामने आया है। मध्यकाल में सिल्क रूट का हिस्सा रहे और वर्तमान समय में भारत-पाकिस्तान की साढ़े चार सौ किलोमीटर लम्बी अंतरराष्ट्रीय सीमा को अपने अंचल में समेटे जैसलमेर की पहचान प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के तौर पर बन चुकी है। जैसलमेर का त्रिकुट पहाड़ी पर स्थित रिहायशी सोनार दुर्ग हो या कलात्मक पटवा हवेलियां और ऐतिहासिक गड़ीसर सरोवर...कुलधरा-खाभा जैसे दर्जनों पालीवाल सभ्यता की पुख्ता तस्वीर पेश करने वाले गांव और दूरदराज के क्षेत्रों में अवस्थित दुर्ग व जैसलमेर, लौद्रवा और अमरसागर आदि के अचम्भे में डालने वाले जैन मंदिर, ये सभी हमारी विरासत के अनमोल अध्याय हैं। इनके साथ ही गांवों तक बिखरी पुरा सम्पदा जिसकी सुध लेने वाला आज कोई नहीं है, बहुत कीमती धरोहर हैं। बताने की जरूरत नहीं है कि जैसलमेर का पर्यटन व्यवसाय अगर आज फल-फूल रहा है व आने वाले समय में जिसकी बढ़ोतरी की अपरिमित संभावनाएं सरकारी-व्यावसायिक स्तर पर जताई जाती हैं, सैकड़ों साल प्राचीन विरासत इसका आधार स्तम्भ है। अगर विरासतों की पूछ-परख ही नहीं की जाएगी और उन्हें वक्त के थपेड़ों से नहीं बचाया जाएगा तो देश और दुनिया के सैलानी भला किस वजह से जैसलमेर का रुख करेंगे, यह शोचनीय प्रश्र है। धरोहरों के संरक्षण के लिए जो भी जिम्मेदार विभाग हैं, वे अपनी जिम्मेदारी कायदे से निभाते कभी नजर नहीं आते। |
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