>>: बिला से बना गांव ‘बिलाली’, 1000 वर्ष पुराना है इतिहास

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अलवर. अरावली पवर्तमाला की तलहटी में बसा बानसूर उपखंड का गांव बिलाली का इतिहास एक हजार वर्ष पुराना है। यह गांव उपखंड मुख्यालय से 21 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा एवं जयपुर-दिल्ली नेशनल हाइवे संख्या-8 से पश्चिम दिशा की ओर 23 किलोमीटर दूर बसा है। बुजुर्गों का कहना है कि बिला से गांव बिलाली बना है। बिलाली बसाने को लेकर भी अलग-अलग मत हैं।
जनश्रुतियों के अनुसार प्रजापत जाति लोग यहां आकर बसे। इसी दौरान बिला से बिलाली गांव बना था। वहीं, गुर्जर समुदाय के लोगों का भी दावा है कि गुर्जर समाज से बिलाली को बसाया है। वर्तमान में सभी जातियां निवास करती हैं, इनमें सैनी, गुर्जर और प्रजापत जाति के लोग अधिक हैं। गांव की आबादी लगभग १२००० है। समय के साथ सुविधाएं बढ़ी, लेकिन आज भी विकास की दरकार है। गांव में पानी का संकट है।
1959 में बनी ग्राम पंचायत
1959 में बिलाली ग्राम पंचायत का गठन हुआ था। गांव के पहले सरपंच जगदीश सिंह शेखावत रहे। उस समय कराना और ज्ञानपुरा बिलाली के अधीन आते थे। वर्तमान में गांव के सरपंच गोदी देवी हंै। बिलाली सहित बड़ागांव और जैतपुर राजस्व गांव है। गांव में करीब 5 हजार मतदाता है। गांव में लोग मजदूरी,खेती-बाड़ी कर अपना जीवन यापन करते हैं। राजकीय सेवा और भारतीय सेना में भी लोग हैं। प्रदेश के आरटीडीसी चेयरमैन धर्मेंद्र सिंह राठौड़ गांव बिलाली के निवासी हैं।
मंदिर व मूर्ति का इतिहास
शीतला माता का मंदिर आस्था का केंद्र है, यहां प्रतिवर्ष मेला भरता है। स्कंद पुराण में शीतलाष्टक स्रोत में वर्णित माता शीतला (शिव की अर्धांगिनी ब्रह्म पुत्री) की मूर्ति आज से लगभग 1000 वर्ष पूर्व जब गांव बसा था धरती चीर कर निकली और आकाशवाणी से गडरिया से उसकी विस्थापना और गांव बसाने की बात कही, पहले तो गडरिया डर गया पर फिर माता का परिचय लोक कल्याण जानकर इसको विधि विधान से मंदिर प्रतिष्ठान करवाया। पश्चिम मुखी 60 फीट ऊंचे मंदिर के बीचों-बीच चौकोर गर्भ गृह में माता शीतला की सुविखंडित निसृजक गैरनक्काशी स्वप्राकटय मूर्तियां विराजित हंै। - रिपोर्ट-संजय मोरीजावाला।

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