>>: 5 हजार किमी दूरी तय कर साइबेरिया से मेनार पहुंचे कुरजां पक्षी

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उदयपुर. मेनार. दुनिया में सरहदें सिर्फ इंसानों के लिए बनी है, परिन्दों के लिए नहीं। परिन्दें तो सरहदों की परवाह किए बिना प्यार का पैगाम लेकर अपनी मंजिल की ओर दौड़े चले आते है। इसका बेहतरीन उदाहरण मेनार में प्रतिवर्ष दिखता है। यहां शीतकालीन प्रवास के लिए आने वाले प्रवासी पक्षी जो मंगोलिया, चीन, तिब्बत, यूरोप, अमेरिका आदि देशों में बर्फबारी के बाद प्रतिवर्ष Òबर्ड विलेज मेनारÓ के जलाशयों पर आते है। सर्दी की शुरुआत के साथ ही मेनार के आसमान में पक्षियों की चहचहाट गूंजने लगी है। इस साल भी मेनार में अक्सर कम दिखाई देने वाले पक्षी दिखाई दे रहे है। वहीं मेनार में 4 साल के लम्बे इंतज़ार के बाद कुरजां (डेमोइसेल क्रेन) फिर आए है। इससे पक्षी मित्रों के साथ आमजन में भी खुशी का माहौल है। अब सर्दी बढ़ने के साथ मेनार के जलाशयों पर प्रवासी पक्षियों का कुनबा भी बढ़ने लगा है। मेनार वेटलैंड पर प्रवासी परिन्दों को निहारने पहुंचे दल को कुरजां पक्षी नजर आए।वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर गुंजन जोशी जयपुर ने मेनार के धंड तालाब पर कुरजां पक्षी की तस्वीर को कैमरे में कैद किया। मेनार में अभी तक 5 कुरजां पक्षी देखे गए है। बता दें, राजस्थान में अनेक जगह ये प्रवास पर आते है, लेकिन इनकी सबसे बड़ी संख्या खीचन में ही दिखाई देती है।

इनका कहना है

कुरजां पक्षी बड़े आकार का पक्षी है, जो मूलतः दक्षिणी पूर्वी यूरोप से लेकर मध्य एशिया, मंगोलिया का उत्तरी भाग, अल्जीरिया का पठार क्षेत्र में ब्रीडिंग करता है। यह 7-8 महीने वहां व्यतीत करने के बाद सर्दियों के दिनों में दक्षिणी गोलार्द्ध की ओर उड़ान भरता है। भूटान, बर्मा, पाकिस्तान, चीन के कुछ भाग सहित दक्षिणी भारत के कर्नाटक सहित राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश के भागों में पहुंचते है। ये फ्लॉक बर्ड्स है, जो हमेशा झुंड में रहता है। यह उड़ान, खाना, पीना सभी कार्य समूह में करता है। मुख्य रूप से ये शाकाहारी पक्षी है, जो घास के नरम हिस्सों, कंद, कीड़े-मकोड़े एवं छोटे-मोटे मेंढक को खा लेता है। अमूमन इसे कॉमन क्रेन पक्षी के साथ दल में देखा जाता है। इस पक्षी का लोक गीतों में भी उल्लेख मिलता है।-डॉ. सतीश शर्मा, वन्य जीव विशेषज्ञ उदयपुर

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