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अब अपना वजूद खो रहा शहर का परकोटा Tuesday 23 May 2023 06:01 PM UTC+00 अजमेर. मुगलकाल में शहर की ढाल बना परकोटा अब अपने वजूद को भी नहीं बचा पा रहा। परकोटे से लगती भूमि पुरातत्व विभाग ने आजादी के पूर्व तत्कालीन मेरवाड़ा एस्टेट (वर्तमान नगर निगम) को सुपुर्द कर दी थी । ताकि यह दीवार सुरक्षित और संरक्षित बनी रहे। लेकिन कालांतर में जिम्मादारों की अनदेखी से आसपास अवैध कब्जे व व्यावसायिक गतिविधियां होने से अब कई जगह परकोटे की दीवार ही नजर नहीं आती। नगर निगम की अन्य कर शाखा में इससे संबंधित मूल रिकॉर्ड तक उपलब्ध नहीं है। लीज पर दी जगह, हुए अवैध बेचान-निर्माण1930 के बाद मेरवाड़ा एस्टेट ने दीवार से सटी भूमि पर भवन स्वामियों की मांग पर वार्षिक किराए के स्थान पंजीकृत किराया लीज डीड निष्पादित कर दी। उक्त दीवार की चौड़ाई पर कोई निर्माण, अतिक्रमण ,बेचान नहीं करने, मालिकाना हक सरकार का रहेगा किराया देने पर ही लीज डीड मान्य रहेगी लेकिन वर्तमान में लगभग उक्त भूमि का अवैध बेचान,निर्माण कर ,अस्तित्व समाप्त कर दिया गया है। नगर निगम का गंज गोदाम, कुत्ताशाला यूनानी अस्पताल और सैकड़ों दुकानें बन चुकी हैं। मुगलकाल में ही बन गया था परकोटामुगलकाल में शहर की बसावट सुरक्षा की दृष्टि से त्रिस्तरीय थी। जिसमें प्रवेशद्वार से पहले पानी भरी खाई हुआ करती थीं। शहर के चारों ओर बनी परकोटे की दीवार का आसार भी 10 से 12 फीट चौड़ा था। घुड़सवार सैनिक 24 घंटे पहरे देते थे। मध्यकालीन युग में सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने प्रजा की सुरक्षा के लिए नगर की चारदीवारी का निर्माण कराया। मुगल काल में शहर पनाह व ब्रिटिश काल में यही सिटीवॉल कही जाने लगी। आम भाषा में कोटवाल भी कहा जाने लगा। मार्ग अनुसार प्रवेश द्वार के नामदीवार में चार मुख्य द्वार बनाए गए। मदार गेट से रास्ता मजार शरीफ पर जाने का था, दिल्ली गेट दिल्ली जाने के लिए था। आगरा के लिए आगरा गेट तथा उसरी गेट और त्रिपोलिया गेट। आगरा गेट के अतिरिक्त सभी प्रवेश द्वार आज भी मौजूद हैं। प्रमुख बिंदूचारदीवारी क्षेत्र मदार गेट से महावीर बाजार, पीआर मार्ग ,खाईलैंड, कोतवाली ,सब्जी मंडी, आगरा गेट ,कांजी हाउस, दिल्ली गेट ,लौंगिया, लाखन कोटडी ,त्रिपोलिया गेट ,झालरा, डिग्गी ,उसरी गेट,कवंडसपुरा होते हुए मदार गेट। मदार गेट को रास्ता चौड़ा करने के लिए तोड़ने का प्रयास किया लेकिन बाद में इस कार्य को रोक दिया गया।- चौड़ाई लगभग 12 से 25 फीट -ऊंचाई लगभग 15 से 30 फीट - लंबाई 7 से 8 किलोमीटर। ------------------------------------------------------------------------------- इनका कहना है. .. एएसआई विभाग या पुरातत्व विभाग को इसे सहेज कर रखने की जरूरत है। अधिसूचना में जिसके स्वामित्व में है उसे इसे संरक्षित करने की जिम्मेदारी है। ओंकार सिंह लखावतपूर्व अध्यक्ष, धरोहर संरक्षण व प्रोन्नोति प्राधिकरण। |
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