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आधुनिकता में खो गए गणगौर के गीत, परंपरा निभाने तक सिमटा पर्व Thursday 04 April 2024 08:49 PM UTC+00 एक समय था जब गणगौर का पर्व आते ही गली मोहल्लों में गणगौर के गीत सुनाई देते थे। गौर गौर गौमती, गोरिए गणगौर, माता खोल किवाडी के स्वर हर घर से आते थे। बालिकाएं समूह में एक साथ गणगौर की पूजा करती थी, लेकिन अब आधुनिकता के चलते सब कुछ बदल गया है। हमारे पर्व अब परंपरा निभाने तक सिमट गए हैं। अब न गणगौर के गीत सुनाई देते हैं और न ही बालिकाएं गणगौर की पूजा करती नजर आती हैं। अब यह पर्व एक दिन होने वाली गणगौर पूजा तक सिमट गया है। गणगौर के गीत अब किताबों में पढ़े जा रहे हैं और मोबाइल पर सुने जा रहे हैं। बुजुर्ग महिलाओं को आज भी अपनी पहली गणगौर याद आती है। जब गणगौर के लिए नव विवाहिताएं पीहर आती थीं, सखी सहेलियों के साथ आनंदित होकर गणगौर की पूजा करती और गीत गाती थीं। पूजा करते-करते सोलह दिन का यह त्योहार कब बीत जाता था, पता ही नहीं चलता। 16 दिन तक की थी पूजा पहले जैसा पर्व का अब उत्साह नहीं |
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