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सरूपगंज. सरूपगंज पुलिस ने छह माह पूर्व हुई हत्या का शनिवार को खुलासा किया। शुरुआत में ब्लाइंड मर्डर लग रहे इस मामले में मृतक के दोस्त ने ही उसकी हत्या की बात स्वीकारी। इस पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया।

थाना प्रभारी हरिसिंह राजपुरोहित ने बताया कि भावरी पुलिया के पास छह माह पूर्व एक व्यक्ति की सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची थी। लाश की शिनाख्त लालाराम पुत्र जगाराम गमेती भील निवासी अम्बा तलोई पुलिस थाना बेकरीया जिला उदयपुर के रूप में हुई। मृतक के परिजनों का सूचित करने पर उन्होंने हत्या होने की बात कर लाश ले जाने से इनकार कर दिया। मृतक की पत्नी सुगना ने लिखित रिपोर्ट देकर बताया कि मृतक काश्त कुएं पर मजदूरी करता था। 30 नवंबर, 2022 को रोहिड़ा से लुंदारा पाली में मजदूरी के पैसे लेने गया था। इस दौरान लुंदारा गया विजीयाराम कुएं पर आ गया मगर मेरा पति घर पर नहीं आया व दूसरे दिन मेरे पति की लाश सरूपगंज में मिली है। ऐसे में हत्या का संदेह है। इस पर पुलिस ने हत्या का प्रकरण दर्ज कर अनुसंधान शुरू किया। आरोपी विजीयाराम व मृतक लालाराम दोनों एक ही कुएं पर रोहिड़ा में कृषि कार्य करते थे।

पुलिस अधीक्षक ममता गुप्ता द्वारा ब्लाइंड मर्डर के प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए त्वरित अनुसंधान कर घटना का खुलासा करने के निर्देश दिए गए। जिस पर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक बृजेश सोनी, वृत्ताधिकारी पिण्डवाड़ा जेठूसिंह करणोत के सुपरविजन में थाना प्रभारी हरिसिंह राजपुरोहित मय टीम की ओर से अनुसंधान किया गया। मृतक के शव का मेडीकल बोर्ड से पोस्टमार्टम करवाया।ऐसे हुआ खुलासा

एफएसएल रिपोर्ट में मृतक की मौत जहर से होना पाया गया। ऐसे में संदिग्ध विजीयाराम पुत्र झालाराम जाति गमेती भील निवासी कम्बोई थाना रोहिड़ा को दस्तयाब कर मनोवैज्ञानिक तरीकों से पूछताछ की गई। इस पर आरोपी ने बताया कि लालाराम किसी अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर उसकी पत्नी के साथ अवैध संबंध बनाने की फिराक में था। घटना के दिन मौका पाकर आरोपी ने मृतक लालाराम के साथ शराब पी। इस दौरान शराब में चूहे मारने का जहर मिलाकर पिला दिया। आरोपी ने बिना जहर की शराब पी और जब लालारामा अचेत होने लगा तो उसकी जेब में से पांच हजार रुपए निकालकर मोटरसाइकल लेकर खुद के कृषि कुएं से पहले आम रास्ते पर जाकर सो गया। ताकि लोगों को लगे कि अभियुक्त विजीयाराम भी शराब के नशे में अचेत अवस्था में मिला और मृतक लालाराम ज्यादा शराब पीने से मर गया।

क्या आप भी समर वेकेशंस में किसी हिल स्टेशन घूमने का प्लान कर रहे हैं और फ्लाइट टिकट्स की बुकिंग करा रहे हों तो एक बार फ्लाइट टिकट्स की कीमतें जरूर देख लें। हो सकता है कि इन कीमतों की वजह से आपकाे बजट थोड़ा बढ़ाना पड़ जाए। दरअसल, छुट्टियां होते ही अधिकतर लोग अब परिवार के साथ लोग घूमने-फिरने निकल रहे हैं। यही कारण है कि इन दिनों फ्लाइट्स में फुल ऑक्यूपेंसी चल रही है। उदयपुर के महाराणा प्रताप एयरपोर्ट से भी आने-जाने वाली फ्लाइट्स फुल चल रही हैं। ऐसे में या तो आपको मनपसंद डेस्टिनेशन पर जाने के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा या फिर अधिक कीमत देकर बुकिंग करानी होगी।

कुल्लू-मनाली, कश्मीर आदि जगहों पर जाने के लिए एयर टिकट्स महंगे

ट्रेवल एजेंट्स के अनुसार इन दिनों किसी भी फ्लाइट में बमुश्किल ही सीट मिल रही है। गर्मी में घूमने का मजा लेने के लिए अधिकतर लोग पहाड़ों का रुख कर रहे हैं। ऐसे में दिल्ली जाने वाली फ्लाइट्स में सबसे अधिक यात्रीभार है। वहीं, दिल्ली से हिल स्टेशंस जैसे कुल्लू-मनाली, कश्मीर आदि जगहों पर जाने के लिए एयर टिकट्स दोगुने दामों में मिल रहे हैं। वहीं, दिसंबर-जनवरी की तुलना में अभी प्रमुख पर्यटन स्थलों के टिकट की कीमत 30-40 फीसदी बढ़ चुकी है। पिछले साल से तुलना की जाए तो फ्लाइट्स के टिकट की कीमतों में सीधा 50 फीसदी तक का इजाफा हो गया है।

बढ़ा यात्रीभार

वहीं, हाल ही एक एयरलाइंस ने दिवालिया होने के कारण अपनी उड़ानें कई जगहों के लिए बंद कर दी है। ऐसे में जो यात्री इस एयरलाइंस से कहीं के लिए महीनों पहले बुकिंग करा चुके थे, उन्हें अब दूसरी एयरलाइंस पर शिफ्ट होना पड़ रहा है। ऐसे में यात्रीभार इस कारण से भी बढ़ा है।

टॉपिक एक्सपर्ट ...

इन दिनों कश्मीर, कुल्लू-मनाली जाने की डिमांड सबसे ज्यादा है। ऐसे में दिल्ली से इन जगहों पर जाने के लिए टिकट्स महंगे हो चुके हैं। उदयपुर से दिल्ली तक का किराया तो अब तक सामान्य ही है, लेकिन आने वाले दिनों में ये बढ़ भी सकता है क्योंकि अभी सभी फ्लाइट्स फुल जा रही हैं।

- अशोक जोशी, पर्यटन व्यवसायी

सस्ती टिकट्स के लिए ये काम करें

एक सर्वे के अनुसार वीकेंड के बजाय हमेशा वीक डेज में ट्रेवल का प्लान करें। सोमवार और बुधवार के बीच फ्लाइट की टिकट 12 से 20 प्रतिशत सस्ती होती हैं। रविवार ट्रेवल के लिए सबसे महंगा होता है। यदि आप वीकेंड के बजाय मंगलवार और गुरुवार के बीच टिकट बुक करते हैं तो कीमतें पिछले पांच वर्षों में औसतन केवल 1.9 प्रतिशत सस्ती हुई हैं। अगर यात्रा से कुछ दिन पहले ही टिकट कराएंगे तो वो आपको काफी महंगा पड़ सकती है। हाल ही में हुई एक रिसर्च से पता चला है कि ट्रेवलिंग से 47 दिन पहले फ्लाइट टिकट बुक करने से आपको सबसे सस्ता हवाई किराया हासिल करने में मदद मिलती है।

वर्तमान में उदयपुर से यहां-यहां के लिए हैं फ्लाइट्स -

दिल्ली के लिए - 5 उड़ानें

मुंबई - 4 उड़ानें

जयपुर - 1 उड़ान

भोपाल - 1 उड़ान

इंदौर - 1 उड़ान

बेंगलुरू - 1 उड़ान

हैदराबाद - 1 उड़ान

अहमदाबाद - 1 उड़ान

महाराणा प्रताप ने 1585ई में चावण्ड में अपनी राजधानी स्थापित की, लेकिन चावण्ड के समीपवर्ती भूभाग का सर्वेक्षण करने से यह धारणा अधिक बलवती होती है कि संभवतः चावण्ड में आने से पूर्व महाराणा ने मुगलों का सफलतापूर्वक मुकाबला करने के लिए उदयपुर जिला मुख्यालय से 75 किमी की दूरी पर दक्षिण दिशा में बलुआ नामक गांव में स्थित उदैय की पहाडियों को उनकी सामरिक दृष्टि से उपयोगिता को मध्यस्थ रखते हुए अपना युद्धकालीन निवास बनाया होगा. इस बात की पुष्टि उदैय की पहाडियों तक पहुंचने के अति संकरे और दुर्गम मार्ग से होती है। महाराणा का बलुआ ग्राम को युद्धकाल के लिए अपना आवास स्थल बनाने का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण इस क्षेत्र के सर्वमान्य और प्रतापी भील सेना नायक जयसिंघ कोटड़िया का होना भी रहा होगा, कोटड़िया एक समृद्ध जमीदार था और,इसके स्वत्व में विशाल उपजाऊ कृषि भूमि के अलावा पर्याप्त पशुधन भी था जो महाराणा केलिए युद्धकाल में सामरिक महत्व रखता था।
उदैय की पहाड़ियों के चारों ओर निर्मित सुरक्षा दीवार का होना तथा समीपस्थ अन्य तीन पहाड़ियों में सामंतो, सैनिकों और प्रजा के लिए निर्माण भी कराया इसकी पुष्टि क्षेत्र के सर्वेक्षण के दौरान प्राप्त भोतिक अवशेषों से भी हो जाती है। इस क्षेत्र से तीन बावड़ियों का मिलना भी इस भूभाग में बसासत को सिद्ध करता है। इन उदैय की पहाड़ियों में अपने निवास को सम्पूर्णरूप से सुरक्षित करने के प्रमाण इसकी समीपवर्ती धजोल और बठौड़ी की पहाड़ियों पर बनी.सैनिक छावनियों से भी होती है।
इसकी बहुत अधिक संभावना प्रतीत होती है.कि उदैय की पहाड़ियों से अपनी सामरिक सुरक्षा का सम्पूर्ण बंदोबस्त कर महाराणा ने चावण्ड को अपनी राजधानी बनाया और विकास.और.समृद्धि के साथ शाति के युग को प्रारंभ कियि।
चावण्ड उदयपुर जिला मुख्यालय से 60किमी की दूरी पर उदयपुर-अहमदाबाद.राजमार्ग संख्या8 पर परसाद.सै12किमी पूर्वदिशा में गरगल नदी के बाएं किनारे पर बसा हुआ है। वर्तमान चावण्ड ग्राम से 1/2किमी की दूरी पर दक्षिण दिशा में गरगल नदी के दायीं ओर स्थित एक मगरी पर अपनी नवीन राजधानी का निर्माण कराया था।इस स्थान के पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान प्राप्त.अवशेषोंं.से भी होती है।ऐसा प्रतीत होता है.कि मगरी की चोटी पर महल रहा होगा और.मगरी की ढलान और.तलहटी पर सामंतो,के रहने के लिए भवन आदि बनाए होंगे।सर्वेक्षण के आधार पर यह कहना काफी तर्कसंगत प्रतीत होता है कि महल.की पूर्व दिशा मे प्रताप की आराध्या मां चामुण्डा की अत्यंत नयनाभिराम मूर्ति है तथा राजमहल के उत्तर में काफी बड़ी भवन संरचना के अवशेष मिलते है.जो संभवतः भामाशाह का आवास रहा होगा।इसके साथ ही यह संभावना भी काफी सवक्त.है कि महल की एक किमी की परिधि में सामान्य.प्रजा रहती होगी क्योंकि यहां से खपरैलों के अवशेष बड़ी संख्या में मिले हैं।यहां पर एक कटावला का तालाब भी है जो खेती हेतु पानी का प्रधान स्रोत रहा था।आज भी यहां कि मिट्टी अत्यंत उर्वरा है जो उस समय में भी कृषि उपज की दृष्टि से महत्वपूर्ण था।
चावण्ड की उत्तर-पूर्व दिशा में लगभग 10किमी की दूरी पर स्थित नठारा-की-पाल का अधिकांश भाग पहाड़ियों की श्रृंखलाओं से चहुंओर घिरा हुआ है।इस क्षेत्र का व्यापक सर्वेक्षण करने.से इस क्षेत्र में बसासत.के.प्रमाण प्राप्त.हुए.है,इसकी पुष्टि बसासत के अवशेषों और.स्थानीय भील.समुदाय.में प्रचलित जनश्रुतियों के आधार पर यह कहना उचित होगा कि इस.क्षेत्र में महाराणा के समय.बस्ती थी और.यहां के भील मुखिया पूंजा कटारा के नेतृत्व में एक सैनिक टुकड़ी सदैव.सहायता के लिए रहती थी ,संभवतःइस टुकड़ी के सैनिक गुप्त सूचनाएं.एकत्र करने.का भी कार्य.करते.रहे.होंगे।गांव के मुखियाओं.से वार्ता करने से यह जानकारी मिली कि नठारा-की-पाल के मौकात फलां.में रियासत काल में लोहा निकाला जाता.था।इसके अतिरिक्त्त इस क्षेत्र के पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान एकत्र मृद्भांडों.और.खपरेलों के अवशेषों में काफी समानता है जो नठारा के प्रतापकालीन.होने.की पुष्टि करते.हैं।
नठारा में बस्ती के प्रमाणों की पुष्टि आलेख के लेखक द्वारा किए गए पुरातात्विक उत्खनन से मिले अवशेषों से भी होती है।इन.पुरावशेषों.मे यहां से प्राप्त.गद्धिया सिकको.से.भी होती है जो चांदी के है।ऐसे.सिक्के सातवीं आठवीं शताब्दी.से लगभग ग्याहरवीं तक प्रचलन.में.रहे.थे।इसके अलावा यहां से प्राप्त.भग्नावशेषों.और.लोहा गलाने की भट्टी के आधार तथा एक टेराकोटा निर्मित छिद्रित पाइपों.से.होती है.जो.संभवतःहवा के प्रवाह.को निरंतर बनाए रखने.के.लिए प्रयुक्त किए जाते थे।

चावण्ड से दक्षिण-पश्चिम दिशा मेंलगभग आठ किमी की दूरी पर स्थित गांव पाल-लिम्बोदा से भी होती है।यह गांव तीन ओर.से पहाड़ियों से.घिरा हुआ है तथा यह चावण्ड और.उदैय.की पहाडियों के मध्य.स्थित होने से बहुत महत्वपूर्ण रहा होगा तथा युद्धकाल में महाराणा को आवश्यक.सामग्री उपलब्ध.कराने के अलावा.सुरक्षा कीदृष्टि से भी अत्यंत महत्व.का रहा होगा।इसकी पुष्टि.यहां के बुजुर्गों में ब्रचलित.कथाओं.से भी.होती है जिनका सारांश यह.है.कि आज भी इन लोगों के मन-मस्तिष्क में प्रताप के.शौर्यऔर धर्मरक्षक स्वरूप की छवि विद्यमान है।
सन्2001में भारतीय पुरातत्व विभाग की जयपुर.शाखा के द्वारा डॉक्टर डिमरी के नेतृत्व में बी आर सिंह,राजेंद्र.यादव.औरविपिन.उप्पल.आदि के.दल.ने यहां वैज्ञानिक तरीके.से उत्खनन कराया जिससे यह.पता चला कि यह.सम्पूर्ण.संरचना का निर्माण तीन अवस्थाओं में कराया गया होगा।यहां किए गए उत्खनन के आधार.पर यह.निष्कर्ष निकलता है कि इस निर्माण पकी हुई मिट्टी की ईंटों,प्रस्तर.खंडों को प्रयुक्त किया गया था तथा मसाले में चूना प्रमुख रूप से उपयोग में.लिया गयाथा।
इस स्थल के उत्खनन द्वारा एक अत्यंत विलक्षण और आश्चर्यजनक संरचना प्राप्त हुई.है जो प्रताप कालीन उच्च अभियांत्रिकी का और.जल.संग्रहण.के प्रबंधन.का अद्वितीय उदाहरण.है।यह संपूर्ण जल संरचना 8.85x6.70 मीटर की है।इसके के मध्य में एक केंद्रीय कक्ष है जो 29.5x 18मीटर का है और इसके चारों ओर 26 वर्गाकार कक्ष है जिनकी माप 74x74सेमी है।यह सभी कक्ष आपस में टेराकोटा पाईप से जुड़े हुए हैं।इन कक्षों की विभाजक दीवार समँपूर्णतःपकी ईंटों से निर्मित है जिसके दोनों ओर.चूने.का.प्लास्टर किया घया है.और.सम्पूर्ण संरचना की फर्श बहुत.पक्की और.प्रस्तर खंडों से.निर्मित है ताकि पानी का रिसाव.नहीँ हो।यह सम्पूर्ण जल संरचना एक अत्यंत मजबूत दीवार से चारों ओर.से घिरी हुई है,संभवतः इसका कारण सुरक्षात्मक रहा होगा।उत्खनन के दौरान.यह.भी.दृष्टिगोचर हुआ कि वर्गाकार कक्षों में अत्यंत.महीन रेत का जमाव.है जो केंद्रीय कक्ष में एकदम.से अनुपस्थित है।इससे जल शुद्धिकरण की प्रक्रिया.को आसानी से.समझा जा.सकतख है। इस.संरचना में पानी के.प्रवेशकी सुविधा तो है.लेकीन निकासी नहीं है जो इसकी उपयोगिता को.स्वतः सिद्ध करता है।इसके अतिरिक्त चावण्ड.के.उत्खनन से राखिए रंग के.मृदभांड मुख्यरूप से मिले.है,दूसरे प्रमुख मृद्भांडों में लाल रंग के मृद्भांडों के अवशेष मिलते.है।इसके अतिरिक्त यहां से अत्यंत.अल्प संख्या
सारांशतः ,उक्त सभी तथ्यात्मक विवरण से यह कहना पूर्णतः समीचीन है कि प्रातःस्मरणीय प्रताप एक असाधारण प्रतिभा के ऐसे वीर योद्धा थे जिसकी तुलना करना असंभव.ही है;साथ.ही उनमें संगठनात्मक एकता विकसित कर रचनात्मक कार्य.करने की अप्रतिम.क्षमता थी।वह एक कुशल प्रशासक,वास्तुविद और अभियांत्रिकी के जानकार भी थे जिसकी पुष्टि चावण्ड को राजधानी बनाने.से.होती है। अत्यंत विषम परिस्थितियों.में अल्प समय.का समुचित उपयोग.करने.की तमाम विलक्षण प्रतिभा उनमें थी।उन्होंने जिस तरीके से चावण्ड के चारों ओर सेटेलाईट बस्तियां बसाकर स्थानीय निवासियों में पारस्परिक विश्वास की भावना विकसित कर अपने चारों ओर.जो सुरक्षात्मक दीवार बना न केवल सामरिक दृष्टि से अपने राज्य को कंटकाविहीन तो किया ही साथ ही स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर अपने राज्य को शक्तिसंपन्न बनाया।इसप्रकार से महाराणा में आपदकाल को अवसर.में बदलने.की अप्रतिम क्षमता तो थी ही,साथ.ही वह मानवीय.प्रयासों से भौगोलिक विषमताओं पर विजय प्राप्त करने.का ऐसे गुणसंपन्न व्यक्तित्व के धनी थे जिसका दूसरा उदाहरण इतिहास में मिलना असंभव.ही.है।और.इसी कारण वे देश काल की सीमाओं.से परे जाकर अनेक राष्ट्रों द्वारा स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने का प्रेरणापुंज बन गए।

आलेख - प्रो. ललित पांडेय

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