>>: भुवाणा में 38 साल बाद गूंजेगी थाली-मांदळ की ध्वनि

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उदयपुर. जहां चाह वहां राह की कहावत को भुवाणा के युवाओं ने चरितार्थ कर दिखाया है। गांव की बैठक में युवाओं ने गवरी लेने पर जोर दिया। काफी सोच-विचार के बाद बुजुर्गों के साथ सभी ने सहमति दी। ऐसे में 38 साल बाद एक बार पुन: गांव की गवरी होगी। इसमें सभी समाजों और परिवारों का सहयोग रहेगा। इसको लेकर गांव के मोतबीर तैयारियों में जुटे हुए हैं।
भुवाणा गांव कुछ दशक पूर्व शहर के नजदीक का बड़ा गांव हुआ करता था। ऐसे में इसकी गवरी को लेकर भी लोगों में काफी उत्साह रहता था। 38 साल पूर्व गांव में प्रतिवर्ष गवरी हुआ करती थी। इसके बाद किसी कारणवश गवरी का आयोजन बंद हो गया। कुछ दिनों पूर्व गांव के प्रतिनिधियों की बैठक हुई। इसमें युवाओं ने गांव की गवरी करवाने की बात कही। काफी सोच-विचार के बाद विभिन्न समाजों के मोतबीरों ने इसके लिए हामी भरी। इसके बाद गांव के बालेश्वरी माता मंदिर में सभी समाजों की एक ओर बैठक हुई। इसमें माताजी और मोटा देवरा से पाती (स्वीकृति) मिलते ही युवाओं और लोगों ने उत्साह से इसकी तैयारियों शुरू कर दी। गांव में डांगी, ब्राह्मण, सुथार, तेली, कुमावत, जैन, कुम्हार, लोहार, भील गमेती आदि समाजों के लोग रहते हैं।

गांव के लोग खेलेंगे गवरी

गवरी के आयोजन में गांव भील गमेती समाज के लोग ही भाग लेंगे। 38 साल पूर्व जो कलाकार बनते थे। उनके परिवार के सदस्य को उसी कलाकार की भूमिका प्रदान की जाएगी। गवरी की परंपराओं और अन्य आयोजनों के लिए अन्य गांव के गवरी के जानकार लोगों से सलाह ली जाएगी।
गवरी के लिए बनाई समिति
सरपंच मोहन डांगी ने बताया कि गवरी के आयोजन के लिए एक समिति बनाई गई है। इसमें विभिन्न समाजों के लोगों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। जिस समाज के जितने लोग है उस आधार पर प्रतिनिधि शामिल किए गए हैं। जो गवरी के दौरान जिम्मेदारी संभालेंगे।

बहन-बेटियों के गांवों में भी उत्सुकता

वार्ड पंच प्रकाश प्रजापत ने बताया कि गांव की गवरी यहां से अन्य जगह ब्याही बहन-बेटियों के गांव में भी खेलेगी। ऐसे में सापेटिया, पानेरियों की मादड़ी, शोभागपुरा, बेदला, सुखेर, अंबेरी आदि गांवों में भी उत्साह है।
भुवाणा में 4 सितंबर सुबह 6.30 बजे से कलाकार कपड़े पहनेंगे। इसके बाद प्रथम दिन गांव के सभी देवरों पर धोक लगाई जाएगी। पहली गवरी खेड़ा देवी मंदिर पर होगी। शुरुआती दिनों में गांव के देवरों पर गवरी खेली जाएगी।

प्रत्येक परिवार से 4 हजार का सहयोग

मिठालाल मेनारिया ने बताया कि सवा माह तक चलने वाले गवरी के अनुष्ठान के तहत जिस गांव की गवरी होती है। उस गांव में 20 दिन तक गवरी खेली जाती है। इसके तहत प्रतिदिन दो से ढाई हजार लोगों का खाना होता है। इसके साथ ही गवरी के कलाकारों के गहने, कपड़े, पेरावणी आदि का खर्च भी होता है। उन्हें अन्य प्रकार की सुविधाएं भी उपलब्ध करवानी पड़ती है। इन सबमें करीब 20 से 25 लाख रुपए का खर्च आने का अनुमान है। ऐसे में गांव प्रत्येक घर से 4 हजार रुपए लिए गए हैं।

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