>>: स्वरूप खो रहे है बूंदी के वेटलेंड, जलीय जीव व परिंदों पर मंडराया संकट

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स्वरूप खो रहे है बूंदी के वेटलेंड, जलीय जीव व परिंदों पर मंडराया संकट
बूंदी. सदियों जिले की समृद्ध जैवविविधता में से यहां की सदानीरा स्वच्छ जल की नदियां व यहां के वेटलेंड अपनी महती भूमिका निभाते रहे हैं और हर साल शीतकालीन प्रवास पर हजारों परिंदे यहां आते रहे है।

जनसंख्या का बढता दबाव तथा बढते जल प्रदूषण से यहां के जलस्रोत दूषित हो चुके हैं साथ ही सभी जलस्रोतों पर मछली पालन से परिंदों सहित अन्य जलचरों के अशियाने छिन्न-भिन्न होने लगे हैं। राज्य में 2017 से वेटलेंड अधिनियम के प्रावधानों को लागू करवाने के लिए अब प्रयास शुरू हुए है। जिससे उम्मीद है कि फिर से परिंदों व जलचरों को उनके खोये हुए आशियाने मिल सकेंगें।

जिले के अधिकांश जलस्रोतों में 12 माह स्वच्छ जल की उपलब्धता के चलते यहां के जलाशय सदियों से विविध प्रजाति के पक्षियों सहित जलीय जीवों के लिए उत्तम आश्रय स्थल बने हुए हैं। यहां पर सदानीरा नदियों सहित दो दर्जन प्राकृतिक झीलें, बांध व तालाब साल भर जलीय जीवों व पक्षियों के कलरव तथा अठखेलियों से आबाद रहते हैं। कई दुर्लभ प्रजाति के पक्षी भी बूंदी के स्वच्छ जल वाले जलस्रोतों से आकर्षित होकर यहां प्रवास पर आते हैं।

यहां के वेटलेंड पर विविध प्रजातियों के कछुए सर्दियों के दिनों में टापुओं पर धूप सेकते दिखाई देते है। इसके अलावा चंबल नदी स्थित जामुनिया द्वीप मगरमच्छों का प्रमुख आश्रय स्थल है,जो अब रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में संरक्षित घोषित कर दियागया है। चंबल व ऐरू नदी में दुर्लभ प्रजाति के उदबिलाव या ओटर भी मिलते हैं। जिले के इंद्रगढ-लाखेरी क्षेत्र की चंबल व मेज नदी में घडिय़ालों की जलक्रीड़ा भी लोगों को आकर्षित करती है।

इन जलाशयों पर रहता है जलीय जीवों का डेरा
जिले में बहने वाली ऐरू, मेज, चंबल, कुरेल, घोड़ा-पछाड़, मांगली, बाणगंगा नदियों में वर्ष भर स्वच्छ जल बहता रहता है जो साफ पानी के जलीय जीवों व पक्षियों के प्रमुख आश्रय स्थल बने हुए हैं। इसी प्रकार बूंदी शहर की रियासत कालीन जैतसागर झील, नैनवां उपखंड की कनक सागर झाील, तलवास की रतन सागर झाील,हिण्डोली की रामसागर स्वच्छ व मीठे पानी की सदानीरा झीलें है। साथ ही हिंडोली क्षेत्र में मेज नदी पर बना जिले का सबसे बड़ा गुढ़ाबांध, नारायणपुर बांध, तालेड़ा का बरधा, बूंदी तहसील का भीमलत-अभयपुरा, गरड़दा बांध व रामगढ़-विषधारी सेंचुरी का झरबंधा जिले के प्रमुख वेटलेंड है।

इन जलस्रोतों पर इण्डियन स्कीमर जैसे साफ पानी के दुर्लभ परिंदे भी प्रवास पर आते हैं। मछली ठेकों ने छीने जलीय जीवों के आशियाने जिले में आने वाले प्रवासी, अन्त: प्रवासी तथा स्थानीय पक्षियों के अलावा जलीय जीवों के प्राकृतिक जलीय आवास मछली ठेकों की वजह से संकट में आ गए हैं। अधिकांश जल स्रोतों पर मछली ठेका होने से परिंदों व जीवों के आश्रय स्थल उजडऩे लगे हैं। प्रवासी पेलिकन जैसे बड़े पक्षियों को किसी भी वेटलेंड पर उतरने ही नहीं दिया जाता हैं। मछली जाल में कई कछुए व अन्य जलीय जीव भी उलझकर जान गंवा देते हैं।

टाइगर रिजर्व व वन क्षेत्रों के बांध भी सुरक्षित नहीं
जिले में हाल ही में अस्तित्व में आए टाइगर रिजर्व क्षेत्र के कोर प्रशासनिक नियंत्रण वाले वन क्षेत्र के बांध भी मछली ठेके की जद में हैं। वन्यजीव प्रेमियों की मांग के बावजूद वन विभाग व प्रशासन ने इन जलाश्यों पर मछली ठेका बंद नहीं करवाया है। टाइगर रिजर्व क्षेत्र के कोर क्षेत्र की भोपतपुरा रेंज के वन क्षेत्र में आने वाले भीमलत व अभयपुरा बांधों पर मछली ठेका चल रहा है जबकि यह क्षेत्र इको-टुरिज्म व पक्षियों का प्रमुख केंद्र हैं।

नवल सागर की जगह बरधा व अभयपुरा को मिले वेटलेंड का दर्जा प्रवासी व स्थानीय पक्षियों के साथ जलीय जीवों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने के उद्धेश्य से हर जिले में कम से कम एक वेटलेंड को मछली ठेके से मुक्त रखना चाहिए। अभी हाल ही में बूंदी शहर के नवल सागर जैसे जलस्रोत को वेटलेंड घेषित कर दिया है जो वेटलेंड के लायक ही नहीं है। इसकी समीक्षा की जाकर बरधा बांध या अभयपुरा बांध को वेटलेंड घोषित करवाना उचित होगा।
पृथ्वी सिंह राजावत, पूर्व मानद वन्यजीव प्रतिपालक एवं पक्षी प्रेमी-बूंदी

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