हनुमानगढ़ जल प्रयोगशाला में जांचे गए पानी के सैंपल को अंतरराष्ट्रीय मान्यता
- जलदाय विभाग की जिला जल विज्ञान प्रयोगशाला को मिली एनएबीएल से मान्यता
- जल के नमूनों की जांच, प्रक्रिया, उपकरण आदि की गुणवत्ता के चलते चयन
अदरीस खान @ हनुमानगढ़. जिला जल विज्ञान प्रयोगशाला में जांचे गए पानी के सैंपल को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर की मान्यता प्राप्त है। जलदाय विभाग की जंक्शन स्थित जल प्रयोगशाला ने पानी जांच की प्रक्रिया में गुणवत्ता बनाए रखने, वैज्ञानिक विधि का पूर्णत: इस्तेमाल करने, साधन-संसाधनों का बेहतर प्रबंध करते हुए उपयोग करने के कारण यह उपलब्धि हासिल की है। नेशनल एक्रीडेशन बोर्ड फोर टेस्टिंग एंड कॉलीब्रेशन लैबोट्रीज (एनएबीएल) ने गुणवत्तापूर्ण कार्य के चलते जिला जल
प्रयोगशाला को आईएसओ/आईईसी के स्तरीय स्टैंडर्ड का प्रमाण पत्र जारी किया गया है।
खास बात यह है कि हनुमानगढ़ जिला जल प्रयोगशाला बहुत कम समय में एनएबीएल का प्रमाण पत्र प्राप्त करने वालों में शुमार हो गई है। प्रदेश के अधिकांश जिलों की प्रयोगशालाओं को इतने कम समय में यह उपलब्धि नहीं मिल सकी है। इससे प्रयोगशाला के अधिकारियों एवं कर्मचारियों में उत्साह का माहौल है। क्योंकि निरंतर कार्य की गुणवत्ता बनाए रखने के चलते ही यह उपलब्धि मिल सकी है। इससे वे और बेहतर कामकाज के लिए प्रेरित होंगे।
गुणवत्तापूर्ण उपकरण
जल प्रयोगशाला के तकनीकी प्रबंधक प्रवीण बिश्नोई ने बताया कि एनएबीएल का प्रमाण पत्र मिलने से जल प्रयोगशाला में पानी के नमूनों की जांच प्रक्रिया और गुणवत्तापूर्ण ढंग से हो सकेगी। यह प्रमाण पत्र गुणवत्तापूर्ण जांच को सुनिश्चित करता है। लैब में अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुसार उपकरण, रिजेंट्स सहित अन्य साधन-संसाधन निरंतर इस्तेमाल होंगे।
वेस्ट वाटर प्रबंधन
जल प्रयोगशाला के प्रभारी एवं कनिष्ठ रसायनज्ञ उम्मेदसिंह यादव ने बताया कि जल प्रयोगशाला में निरंतर अंतरराष्ट्रीय एवं एनएबीएल के स्तर के हिसाब से पानी के नमूनों की जांच आदि का कार्य किया जा रहा था। इसकी निरंतरता के चलते प्रमाण पत्र मिला है। प्रयोगशाला में ना केवल पानी के नमूनों की जांच गुणवत्तापूर्ण ढंग से की जाती है बल्कि वेस्ट वाटर के प्रबंधन की भी अगले सौ वर्ष के हिसाब से तैयारी है। वेस्ट वाटर तीन तरह की प्रक्रिया से होकर गुजरता है। उसे जमीन में या खुले में नहीं छोड़ा जाता है। पूर्णत: इको फ्रेंडली प्रक्रिया है। इसके अलावा बैक्टीरिया जांच आदि में डबल डिस्टल वाटर उपयोग में लिया जा रहा है। इसके लिए भी बरसात के पानी का इस्तेमाल होता है। बरसाती पानी के भंडारण वगैरह की लैब में पूरी व्यवस्था है। यह सब व्यवस्थाएं लैब को एनएबीएल प्रमाण पत्र दिलाने में सहायक सिद्ध हुई।
कोरोना काल में जन सेवा
बड़ी बात यह कि जल प्रयोगशाला ने कोरोना संक्रमण संकटकाल में जन सेवा भी बहुत की। लैब में सैनेटाइजर बनाकर आमजन, सामाजिक संगठनों तथा सरकारी कार्यालयों में वितरित किया गया। इसके लिए किसी से कोई शुल्क नहीं लिया गया। साथ ही सरकारी बजट से भी कोई अतिरिक्त भुगतान इसके लिए नहीं उठाया गया। लैब के कर्मचारियों ने ही इसमें आर्थिक सहयोग किया है।
दस हजार से अधिक सैंपल जांच
जिला जल प्रयोगशाला में दस हजार से अधिक सैंपल हर वर्ष जांचे जाते हैं। जीवाणु जांच के लिए चिकित्सा विभाग, जलदाय विभाग तथा प्रयोगशाला के कार्मिक सैंपल लेते हैं। इसके अलावा रसायनिक, अवशेष क्लोरिन, एनआरडीडब्ल्यू सहित अन्य तरह की जांच के सैंपल केवल जलदाय विभाग एवं लैब कार्मिक ही लेते हैं। यदि कोई आमजन पानी का सैंपल जंचवाना चाहे तो इसके लिए उसे भुगतान करना पड़ता है। लैब में पीएच, एलकेलिनिटी, टोटल हार्डनेस, क्लोराइड, कैल्शियम, मैग्निशियम, फ्लोराइड, नाइट्रेट, टीडीएस आदि की जांच की जाती है। हालांकि लैब में पानी में हैवी मेटल की जांच नहीं होती।