>>: ​video----चिकित्सा मंत्री के गृहजिले में 39 साल पहले बसी कॉलोनी पीएचसी को तरसी

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नागौर. चिकित्सा मंत्री के गृहजिले नागौर से हर सरकार में कई मंत्री व विधायक बने, लेकिन 39 साल से चिकित्सा सुविधा के लिए तरस रहे पुराना हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी के बाशिन्दों को आज भी एक अदद पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र) का इंतजार है। करीब 15 से बीस हजार की आबादी वाले इस क्षेत्र के निवासियों के लिए रात बिरात तबीयत बिगडऩे पर निजी अस्पतालों में जाकर उपचार के नाम पर अपनी जेब कटवाना मजबूरी बन चुका है। शहर का पुराना अस्पताल बीकानेर रोड पर शिफ्ट होने के बाद मिर्धा कॉलेज के पीछे बसे पुराने हाउसिंग बोर्ड सहित इस परिक्षेत्र की आठ-दस कॉलोनियों के बाशिंदों की परेशानी और बढ़ गई है। पहले जहां चार किलोमीटर पर उपचार मिल जाता था, वहीं अब नौ किलोमीटर का सफर तय करना पड़ रहा है। लेकिन इतने वर्षों में ना तो जनप्रतिनिधियों ने शहर की इस समस्या पर ध्यान दिया और ना ही सरकार के कारिन्दों ने।

1985 में बसी थी कॉलोनी

मिर्धा कॉलेज रोड पर हाउसिंग बोर्ड ने 1985 में कॉलोनी विकसित की थी, तभी से लोग यहां बसना शुरू हो गए। उस समय आवासन मंडल ने मूलभूत सुविधाओं के तहत एलोपैथिक डिस्पेंसरी के लिए जगह छोड़ी थी, लेकिन आज तक वहां चिकित्सा एवं स्वाथ्य विभाग ने प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तक स्वीकृत नहीं किया, कभी जगह का अभाव तो कभी स्टाफ की कमी का कहकर टालते रहे।

आस-पास बसी 8-10 कॉलोनी

समय के साथ हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी इलाके में करीब आठ से दस निजी कॉलोनियां भी बस गई। इनमें लक्ष्मीनगर, रामनगर, सूफिया कॉलोनी, सतगुरु नगर, भारत नगर, रामदेव कॉलोनी, जाट कॉलोनी, दीप कॉलोनी व बीएसएफ कॉॅलोनी शामिल है। इनमें करीब 5 हजार मकान बने हुए है तथा करीब 15 से बीस हजार की आबादी निवास कर रही है। रात्रि में परिवार के किसी सदस्य की तबीयत बिगडऩे पर मजबूरन उसे निजी चिकित्सालय में जाना पड़ता है। वहां भी जरूरी नहीं कि उपचार मिल ही जाए। स्थिति गम्भीर देख निजी अस्पातलों के चिकित्सक हाथ खड़े कर देते हैं और मरीजों लेकर 9 किलोमीटर दूर जेएलन अस्पताल की दौड़ लगानी पड़ती है। छोटी- मोटी बीमारी में लोग जेएलएन में जाने से बचने लगे हैं।

अस्पताल की जगह को आयुर्वेद विभाग ने कराया आवंटित

आवासन मंडल की ओर से एलोपैथिक डिस्पेंसरी (पीएचसी) के लिए छोड़ी गई जमीन भी कुछ लोगों की राजनीति का शिकार हो गई। इन लोगों ने कॉलोनी में आयुर्वेदिक अस्पताल खोलने के लिए तत्कालीन जिला कलक्टर समित शर्मा से मांग की और उन्हें प्रस्ताव बनाकर दिया। कलक्टर ने उस प्रस्ताव को सरकार के पास भेजा। बाद में सरकार ने पीएचसी के लिए छोड़ी गई जमीन को आयुर्वेद विभाग को आवंटित कर दिया। वर्तमान में वहां जिला आयुर्वेदिक चिकित्सालय संचालित हो रहा है।

जनसेवा समिति ने चिकित्सा मंत्री के समक्ष रखी थी डिमांड

वर्ष 2005 में आवासन मंडल जनसेवा समिति के अध्यक्ष माडूलाल तथा सचिव रमेश अपूर्वा ने तत्कालीन चिकित्सा मंत्री राजेन्द्र राठौड़ व नागौर विधायक रहे गजेन्द्रसिंह खींवसर के समक्ष यहां पीएचसी खोने की मांग रखी थी। बाद में यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया और जमीन भी चली गई। उस दौरान सीएमएचओ भी स्टाफ की कमी का बहाना बनाकर टाल गए और उस मौके का फायदा आयुर्वेद विभाग ने उठाया

विधानसभा में उठ चुका मुद्दा

जानकारों ने बताया कि गत कांग्रेस सरकार में नागौर विधायक मोहन चौधरी ने पुराना अस्पताल में चिकित्सा मंत्री के समक्ष सेटे लाइट अस्पताल खोलने की मांग रखी थी, लेकिन चिकित्सा मंत्री ने शहर की दो लाख की आबादी पर सेटेलाइट अस्पताल खोलने का प्रावधान होने की बात कहकर इस बड़ी समस्या को दरकिनार कर दिया। जबकि कांग्रेस सरकार में गांव-गांव पीएचसी खोले गए और पीएचसी को सीएचसी में क्रमोन्नत किया गया।

इनका कहना है

- चिकित्सा विभाग पहले भी स्टाफ की कमी बताकर इस मांग को टाल चुका है। यदि विभाग पीएचसी की स्वीकृति देताा है तो हाउसिंग बोर्ड के कार्यालय में डिस्पेंसरी खुल सकती है।

रमेश अपूर्वा, जिला महामंत्री भाजपा व स्थानीय निवासी।

- कॉलोनी में एलोपैथिक डिस्पेंसरी नहीं होने से बड़ी समस्या है। छोटी-मोटी बीमारी में मजबूरीवश निजी अस्पतालों की शरण में जाना पड़ता है। वहां मरीज का लम्बा चौड़ा बिल बन जाता है। जनता की सरकार को आमजन की सोच कर कॉलोनी में सीएचसी खोलनी चाहिए, ताकि मध्यम वर्गीय लोगों को निशुल्क उपचार की सुविधा मिल सके। चिकित्सा मंत्री का गृह जिला होने से उनकों भी इस पर गौर करना होगा।

अजीत ओझा, एडवोकेट एवं स्थानीय निवासी।

-अभी तक किसी भी संस्था या लोगों ने पुराना हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में एलोपैथिक डिस्पेंसरी (पीएचसी) खोलने का प्रस्ताव नहीं दिया है। यदि मांग आई तो जनता क्लिनिक खोलकर लोगों को राहत पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा।

महेश वर्मा, सीएमएचओ, नागौर

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