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राजस्थान में मोर की जान सांसत में Tuesday 13 February 2024 03:54 PM UTC+00 राज्य में गांवों की खुशहाली का प्रतीक एवं भीलवाड़ा जिले का शुभंकर राष्ट्रीय पक्षी मोर की जान खतरे में है। राज्य में मोर की चालीस फीसदी आबादी घटी है। यहां चिंताजनक है। पुलिस के आंकड़े बताते है कि महज सात साल में मोर की हत्या के राजस्थान में दो हजार से अधिक मुकदमें दर्ज हुए। इनमें अकेले पीपुल फॉर एनीमल्स संस्था ने 359 मुकदमें राज्य के विभिन्न जिलों में दर्ज कराए।
पीपुल फॉर एनीमल्स संस्था ने हाल ही में अजमेर जिले के बांदनवाड़ा कस्बे के बगराई चरागाह में 50 से अधिक माेरों एवं बूदी जिले के नैनवा तहसील के भांडेड़ा में बांसी कस्बे के निकट 5 मोरों की जहरीले दाने डाल हत्या की प्राथमिकी सम्बंधित पुलिस अधीक्षक को दी। पुलिस और वन विभाग की अनदेखी सजा व जुर्माना का प्रावधान पर्यावरण विद सत्यनारायण व्यास बताते है कि मोर वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के तहत संरक्षित है और धारा 51 (1-ए) के अंतर्गत मोर की हत्या के जुर्म में सात साल की सजा के साथ जुर्माने का प्रावधान है। मोर की आबादी चालीस फीसदी घटी राज्य में मोर वध की घटनाओं को रोकने के लिए वन्य जीव एक्ट है। जहरीला दाना फेंक व जाल बिछा मोर का शिकार किया जा रहा है। मोर की आबादी भी राज्य में चालीस फीसदी घटी है। हाईकोर्ट के प्रतिवर्ष मोर गणना कलक्टर की अध्यक्षता में गठित कमेटी से कराने के आदेश है, लेकिन इसकी पालना नहीं हो रही। सरकार ने वर्ष-2018 में मोर की आबादी के आंकडे अंतिम बार सार्वजनिक किए थे। आंकड़ों के अनुसार मोर की कुल आबादी छह लाख सात हजार 360 थी, जो अब और घटी है। - बाबूलाल जाजू, प्रांतीय संयोजक, पीपुल फॉर एनीमल्स मोरों के ठिकाने पर आवासीय कॉलोनी आबादी बढ़ने व मोरों के ठिकानें आवासीय कॉलोनियोंं में तब्दील होने से भी शहर से मोर लुप्त हो रहे है। मोर के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए कार्ययोजना बना रखी है। |
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