>>: Video: लकड़ी के भाले से खेत में तैयारी करने वाले देवेंद्र ने टोक्यो में जीता रजत, पढ़ें संघर्ष एवं कामयाबी की कहानी

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जयपुर। सुबह 7.30 बजे का समय। देश के लोग टकटकी लगाए टीवी के आगे बैठे नजर आए। जैसे ही देवेंद्र झाझड़िया मैदान में उतरे तो भारत माता की जय के नारे गूंज उठे। हर कोई देवेंद्र के लिए दुआ करता नजर आया। देवेंद्र ने जैसे ही भाला 64.35 मीटर दूर जाकर गिरा तो लोग खुशी झूम उठे। कुछ ऐसा ही नजारा सोमवार को देखने को मिला। इसी के साथ देवेन्द्र टोक्यो पैरालिंपिक में रजत पदक भारत की झोली में डालकर खुद को गौरवान्वित महससू किया। रजत पदक मिलने का समाचार मिलते ही सादुलपुर उपखण्ड की झाझडिय़ों की ढाणी में जश्न का माहौल हो गया।

जिले के खिलाड़ियों व खेल प्रेमियों ने बधाईयां देना शुरू कर दिया। देवेन्द्र की इस जीत पर जिले में त्योहार का माहौल बना हुआ है। मां व अन्य परिजनों ने घर में दीपक जलाकर खुशी का इजहार किया। खुशियों के पटाखे छोड़े और मिठाई बांटकर जश्न गया। गौरतलब है कि देवेन्द्र ने 2016 को रियो ओलंपिक में विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए जैवेलिन थ्रो में स्वर्ण पदक हासिल किया था। उन्होंने खुद का ही रिकॉर्ड तोड़ा और नया विश्व रिकॉर्ड बनाया था। उस समय उन्होंने 63.97 मीटर भाला फैंककर ये रिकॉर्ड कायम किया था।

करंट से गवाना पड़ा था हाथ
देवेंद्र झाझडिय़ा का हाथ आठ साल की उम्र में पेड़ पर चढ़ते समय करंट लगने से हुए हादसे के कारण काटना पड़ा। लेकिन देवेंद्र ने हिम्मत नहीं हारी। परिजनों ने उसकी काबिलियत को देखते हुए आगे बढ़ाया। उसका उत्साहवर्धन किया। माता-पिता ने अभाव में जीकर देवेन्द्र को आगे बढ़ाने में पूरा सहयोग किया। निकटवर्ती गांव रतनपुरा की स्कूल में दसवीं तक अध्ययन किया। उसके बाद हनुमानगढ़ कॉलेज में बीए की पढ़ाई पूरी की। निशक्तता के बावजूद इस युवा ने एथलेटिक्स को चुना। 10 जून 1981 को जन्मे देवेन्द्र तैयारी के लिए सुबह-शाम और दोपहर खेतों में लकड़ी का भाला बनाकर फेंकते थे।

यह पुरस्कार मिल चुके
भाला फेंक के इस प्रसिद्ध खिलाड़ी को वर्ष 2004 में भारत के राष्ट्रपति की ओर से विशेष योग्यता पुरस्कार प्रदान किया गया। 2005 में राजस्थान सरकार ने महाराणा प्रताप पुरस्कार से नवाजा। पैराओलम्पिक कमेटी ऑफ इण्डिया ने 2005 का पीसीआई आउट स्टेडिंग परफोरमेंस अवार्ड प्रदान किया। राष्ट्रपति ने 2005 में अर्जुन पुरस्कार प्रदान किया। राजस्थान के महाराणा मेवाड़ फाउण्डेशन ने 2007 का अरावली सम्मान प्रदान किया। झाझडिय़ा को 2012 में पदमश्री अवार्ड प्रदान किया गया।

दर्ज है विश्व रिकॉर्ड
देवेन्द्र के नाम सबसे लम्बी दूरी का भाला फेंकने का विश्व रिकॉर्ड दर्ज है। उन्होंने वर्ष 2002 में 62.15 मीटर दूर तक भाला फेंककर कोरिया में हुए पेसेफिक गेम में नए विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीता। इसके अलावा वर्ष 2004 में एथेंस पैरा ओलम्पिक में भी स्वर्ण पदक जीता था।

ढाणी में जन्मा लाडला बना रहा इतिहास
- झाझडिय़ों की ढाणी में जन्मे देवेन्द्र ने अंतर विश्वविद्यालय खेल प्रतियोगिता में सक्षम खिलाडिय़ों के साथ भाग लेकर 2001 में पहला स्वर्ण पदक प्राप्त किया।
-2002 में बुसान (दक्षिण कोरिया) में 8 वें फेसफिक गेम्स में जीवन का प्रथम अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक प्राप्त किया।
-2003 में ब्रिटेन में ब्रिटिश ओपन चैम्पियनशिप में जेवेलिन में स्वर्ण पदक जीता।
-2004 के एथेंस ग्रीस पैरा ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास बनाया।
-2006 में मलेशिया पैरा एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीता। कुआलालम्पुर (मलेशिया) में आयोजित 9वें पैरा एशियन खेलों में रजत पदक प्राप्त किया।
-2007 ताईवान में आयोजित पैरावल्र्ड गेम्स में स्वर्ण पदक प्राप्त किया।
-2013 में लियोन फ्रांस में एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक देश की झोली में डाला।
- 2021 में स्पोर्टस मैन ऑफ द डिकेट अवार्ड से नवाजा गया

देवेन्द्र ने नंगे पैर खेतों में की थी तैयारी
सादुलपुर उपखण्ड की झाझडिय़ों की ढाणी में रामसिंह व जीवनी देवी के घर जन्मे देवेन्द्र झाझडिय़ा के पिता की पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं थी। अपनी मेहनत के दम पर देवेन्द्र ने अब रियो पैराओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा था। 10 जून 1981 को जन्मे देवेन्द्र तैयारी के लिए सुबह-शाम और दोपहर खेतों में लकड़ी का भाला बनाकर फेंकते थे। आर्थिक हालाल अच्छे नहीं होने के कारण देवेन्द्र को बिना जूतों के नंगे पैर ही खेतों में तैयारी की।

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