>>: VIDEO...राजस्थान के इस जिले की अनोखी वराह अवतार लीला को देखने विदेशों से पहुंचते हैं लोग

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-शहर के बंशीवाला मंदिर में मनाया गया वराह अवतार उत्सव
-वराह अवतार की लीला देखने के लिए बंशीवाला में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब


नागौर. वराह अवतार शुक्रवार को हर्षोल्लाषपूर्वक मनाया गया। इस मौके पर नगसेठ बंशीवाला मंदिर में वराह लीला हुई। लीला में वराह अवतार के रूप में भगवान विष्णु ने वराह स्वरूप धारण करने के साथ सागर में जाकर पृथ्वी को अपने दाढ़ पर लेकर बाहर आए। इस दौरान हिरण्याक्ष का वध भी किया गया। इन पौराणिक प्रसंगों को वराह लीला में प्रतीकात्मक तौर पर दर्शाया गया तो श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़ ने करतल ध्वनि के साथ जयकारे लगाए। इस दौरान मंदिर परिसर में चारों ओर भगवान वराह के जयघोष गूंजते रहे। स्थिति यह रही कि मंदिर परिसर के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक केवल श्रद्धालुओं की भीड़ ही नजर आ रही थी। कार्यक्रम के दौरान पूरे परिसर में तिल तक रखने की जगह नहीं बची थी।


बंशीवाला मंदिर में देर शाम भगवान वराह की लीला शुरू हुई। निज मंदिर से निकले भगवान वराह चौक परिसर में पहुंचे। यहां पर पृथ्वी के रूप में बैठी नन्ही बालिका को गोद में उठाया। इस दृश्य को देख रहे श्रद्धालुओं ने भगवान का श्रद्धाभाव से अर्चन शुरू कर दिया। इधर भगवान वराह के रूप में हिरण्याक्ष के ललकारने पर उसके सामने पहुंचे, पहले मल्ल युद्ध हुआ, फिर उसने भगवान पर गदा का प्रहार किया, लेकिन भगवान की गदा उसके छाती पर पड़ते ही काल के गाल में समा गया। भगवान की इन लीलाओं का वराह अवतार की भूमिका निभा रहे पुजारी महेश ने भाव-भंगिमा के माध्यम से बखूबी दर्शाया। इसके बाद भगवान वराह गदा के साथ परिसर में बनी बारियों में हर्षनाद करते रहे। करीब एक घंटे तक भगवान वराह की लीला चलती रही। इस दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान की लीलाओं को अपने मोबाइलों में भी कैद करते नजर आए। लीला के दौरान वराह भगवान के समक्ष श्रद्धालुओं की भीड़ नतमस्तक रहा। इसके पूर्व निज मंदिर में भगवान वराह का विधिपूर्वक अर्चन किया। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुए अर्चन में केवल गिने-चुने लोगों को ही शामिल किया गया।


वराह अवतार के रूप में सजे बंशीवाला
नगरसेठ बंशीवाला का शुक्रवार को वराह भगवान के मुखौटों के साथ शृंगार किया गया। वराह रूप में बंशीवाला के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। बताते हैं कि वराह अवतार के लिए बने मुखौटे का वजन पांच से सात किलो के करीब है। इसे बाठडिय़ा का चौक के श्रीनिवास सोनी ने उत्सव स्थापनाकाल के समय ही बनाया था। इसे मिट्टी-कुट्टी के तरीके से बनाया गया। बनाए जाने के दौरान इसकी पवित्रता एवं विधि का पूरा ध्यान रखा गया था। लीला के दौरान मुखौटे को सिर पर व्यवस्थित करने के लिए दस मीटर के दो साफों का प्रयोग करने के साथ ही रूई की तीन चार गद्दियों का प्रयोग किया जाता है। ताकी यह पूरी तरह से व्यवस्थित रहे।


उत्सव के एक माह पहले ही शुरू हो जाती है तैयारी
बताते हैं कि वराह अवतार में भूमिका निभाने वाले को पूरे एक माह न केवल ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है, बल्कि भोजन भी केवल एक समय करना रहता है। इस दौरान बाहर से आए भोजन या अन्य खाद्य सामग्री का सेवन करना प्रतिबंधित रहता है। इसका पूरा पालन करने के साथ ही भगवान वराह का रोजाना अर्चन भी करना पड़ता है।

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