कोटा। कहते हैं कि इंजीनियर और डॉक्टर बनने का रास्ता कोटा होकर जाता है। बस इसी आस में हर साल सैंकड़ों छात्र राजस्थान की कोचिंग सिटी कहे जाने वाले कोटा शहर पहुंचते हैं। यहां इन मासूम बच्चे, जिन्होंने दुनिया की अभी भागदौड़ तक नहीं देखी, उन पर सपनों और उम्मीदों का बोझ इतना बढ़ जाता है कि कदम लड़खड़ाने लगते हैं। इस बोझ के चलते कोचिंग सिटी कोटा अब सुसाइड फैक्ट्री बनती जा रही है। दरअसल आंकड़े यही बयां कर रहे हैं, बीते 48 घंटों में 2 मासूम बच्चों ने अपनी जान दे दी और इस साल अब तक 19 बच्चे मौत को गले लगा चुके हैं। छात्रों में बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं ने सभी को झकझोर दिया है। किसी को भी समझ नहीं आ रहा है कि इन घटनाओं को कैसे रोकें।
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आगे निकलने की होड़ में हिम्मत हार रहे बच्चे
आज कोटा की इमेज ऐसी बन चुकी है कि यहां के इंस्टीट्यूट के ज्यादा से ज्यादा बच्चे निकलते हैं। बस यहीं से शुरु होती है, सबसे आगे निकलने की होड़, लेकिन हर बच्चा जीते ऐसा तो हो नहीं सकता, फिर उसके सामने परिवार और समाज का ऐसा डर घूमने लगता है कि वह जिंदगी से हार मान लेता है। ऐसे में कोटा हंसते-खेलते बच्चों के लिए काल का काम कर रहा है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि घर से दूरी और परिवार से कई दिनों तक बात न होने पर छात्र निराश हो जाते हैं और उनके मन में अपने आप को ख़त्म करने के विचार आते हैं। मौजूदा समय में कोटा में देशभर के लगभग 3 लाख छात्र शहर के विभिन्न संस्थानों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे समय में 2 मासूम बच्चों की आत्महत्या ने देशभर के उन पैरेंट्स को परेशान कर रखा है, जिनके बच्चे यहां पढ़ाई कर रहे हैं।
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अब यादों में रह गए आविष्कार और आदर्श
बीते 48 घंटों में कोटा शहर में महाराष्ट्र के आविष्कार और बिहार के आदर्श ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली। आविष्कार नीट की तैयारी कर रहा था और कोचिंग सेंटर में टेस्ट देने बाद छठी मंजिल से नीचे कूद गया। पढ़ने में होशियार आविष्कार के टेस्ट में कम नंबर आए थे। बस इसी तनाव को वह झेल नहीं पाया। कुछ दिनों पहले ही बुआ मिलने भी आईं थी, लेकिन मासूम बच्चा अपना दर्द को उनके साथ साझा भी नहीं कर पाया और अंदर ही अंदर घुटने लगा। बीते एक साल से नानी के साथ रह रहा आविष्कार उन्हें भी अपने दिल की बात बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और उसने मौत को गले लगा लिया। ऐसी ही कहानी बिहार के आदर्श की भी थी। वह फ्लैट में बहन और बुआ के लड़के साथ रहता था। आदर्श के भी टेस्ट में लगातार कम नंबर आ रहे थे, जिसे लेकर वह परेशान था। रविवार को टेस्ट देकर आने के बाद वह कमरे में चला गया, जहां से वह फिर कभी नहीं लौटा।
बच्चों पर बढ़ गया बहुत ज्यादा तनाव
आज के दौर में छात्रों पर बहुत ज्यादा प्रेशर डाला जाता है। बच्चों पर पेरेंट्स की आकांक्षाओं पर खरा उतरना, कोचिंग सेंटर के लगातार टेस्ट के साथ-साथ 12वीं क्लास का भी प्रेशर होता है। ऐसे में कोचिंग में पढ़ने वाला बच्चा एक साथ कई तनाव को साथ लेकर चलता है। दरअसल ये छात्र अपने परिवार से दूर अकेले होते हैं। ऐसे में ये किसी से खुलकर अपनी बात नहीं कर पाते हैं। अपने मन की पीड़ा को ये बच्चे किसी के साथ शेयर नहीं कर पाते हैं। तनाव उनके दिलों दिमाग पर छाने लगता है और धीरे-धीरे इन्हें सुसाइड की तरफ ले जाता है। अगर ये बच्चे किसी से अपने मन की बात कर पाते तो उनकी नेगेटिव सोच खत्म हो सकती है। ऐसे में पेरेंट्स को भी ये समझना चाहिए कि करियर के कई ऑप्शन होते हैं। कोचिंग सेंटर पर पढ़ने वाले बच्चों को तनाव से बचाना बेहद जरूरी है। ऐसे में कोचिंग संस्थाओं को काउंसिल सेल बनानी चाहिए। यहां प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक समय-समय पर इन बच्चों को मोटिवेट करते रहें, ताकि ये तनाव से खुद को दूर रख सकें।
प्रो. एके मलिक, पूर्व विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग, जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी, जोधपुर