>>: VIDEO...पशुपालक बोले: सुविधाएं तो बढ़ी है, फिर भी बेहतर चिकित्सा सुविधा से अभी अधिकतर पशु वंचित

>>

Patrika - A Hindi news portal brings latest news, headlines in hindi from India, world, business, politics, sports and entertainment!

नागौर. पशुओं के कल्याण एवं इनकी बेहतरी के प्रति लोगों को सजग करने के लिए हर साल विश्व पशु कल्याण दिवस चार अक्टूबर को मनाया जाता है। पहली बार वल्र्ड एनिमल डे 24 मार्च, 1925 को जर्मनी के बर्लिन में सिनोलॉजिस्ट हेनरिक ज़िमर्मन की पहल पर मनाया गया था. इस दिन को मनाने का उनका उद्देश्य पशु कल्याण के बारे में जागरूकता फैलाना था। इसके बाद से इसके मनाए जाने का क्रम दुनिया भर में शुरू हुआ। वर्ष 1925 से अब तक 98 साल हो चुके हैं। उस दौरान से अब तक कई परिवर्तन हुए। पशु चिकित्सा की नवीन तकनीकी आई, और पशुओं की चिकित्सा सुविधा में बढ़ोत्तरी हुई। दुग्ध व्यवसाय भी तेजी से बढ़ा। इस संबंध में पशु पालन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पहले चिकित्सा सुविधा ज्यादा नहीं थी, अब पालकों के पशुओं को यह सुविधा आसानी से मिलने लगी है। यही नहीं, बल्कि टीकाकरण एवं बीमा योजना सहित कई सरकारी योजनाओं के संचालन का सीधा लाभ पशु पालकों को मिला है। पशु पालकों से बातचीत हुई तो उनका कहना था कि चिकित्सा तो मिली, लेकिन स्थिति अभी बहुत बेहतर नहीं है। विशेष ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के रहन-सहन के साथ चिकित्सा सुविधा की स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। येाजनाओं की स्थिति तो यह है कि टीकाकरण जरूर हो जाता है, और कुछ दवाएं मिल जाती है, लेकिन पालन की दृष्टि से व्यवसायिक स्थिति में आगे बढऩे के लिए पहले भी संघर्ष करना पड़ रहा था, आज भी संघर्ष कर रहे हैं।
चिकित्सा सुविधा तो बढ़ी है, लेकिन मुश्किल भी
पशुओं के कल्याण एवं इलाज के लिए अब कई जगह अस्पताल तो खुल गए, लेकिन सुविधाएं ज्यादा नहीं बढ़ी। जबकि पशुधन ही विकास का मूल आधार होता है। कृषि भी इससे जुड़ी है। सरकारें पशुधन के विकास में बजट का ज्यादा व्यय अभी भी नहीं करती हैं। योजनाओं का लाभ उठाने के लिए पशुपालकों को भी जागरुक होना पड़ेगा। विभागीय स्तर पर पशुपालकों से संपर्क कर कार्यक्रमों के आयेाजन कर उनको जानकारी देनी चाहिए। आवश्यकतानुसार अभियान भी चलना चाहिए।
पवन कुमार, पशुपालक, श्रीबालाजी
सरकारी योजनाओं का लाभ तो पशुओं को मिला है। अब टीकाकरण आदि के लिए भटकना नहीं पड़ता है, लेकिन यह कोई बहुत ज्यादा सुविधा नहीं है। कई गांव ऐसे हैं, जहां पशुओं की संख्या बहुत ज्यादा है। इसके बाद भी केवल जागरुकता एवं जानकारी के अभाव में न तो बेहतर इलाज की सुविधा मिल पाती है, और न ही योजनाओं का। शिक्षित पशुपालकों की संख्या बेहद कम है। सरकार योजनाओं का इमानदारी से क्रियान्वयन कराए और पशुधन का पालन करने वालोंं को पर्याप्त सहायता दे तो शायद युवाओं का पलायन भी रुक जाए।
गुड्डी देवी, महिला पशुपालक, हनुमाननगर
हालांकि मुख्यमंत्री नि:शुल्क दवा योजना का लोगों को लाभ तो हुआ है, लेकिन गंभीर चिकित्साओं के लिए आज भी ग्रामीणों को अपने पशुओं को वाहनों में लादकर कई किलोमीटर जिला अस्पताल में जाना पड़ता है। यह सभी सुविधाएं आज भी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं हैं। स्थिति यह है कि उपकेन्द्रों में ज्यादातर पशुधन सहायक मिलते हैं, डॉक्टर्स नहीं उपलब्ध रहते हैं। यह किसकी कमी कमी है।
सहदेव, पशुपालक, श्रीबालाजी

पहले से बेहतर हुआ है पशुपालन
पशुपालन विभाग के वरिष्ठ चिकित्साधिकारी डॉ. मूलाराम जांगू से बातचीत हुई तो इनका कहना था कि पिछले कई सालों के दौरान पशुपालन व्यवसाय में काफी परिवर्तन आया है। पहले सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में न तो चिकित्सा सुविधा थी, और नही डॉक्टर्स पहुंच पाते थे। अब ऐसा बिलकुल नहीं रहा है। अब तो दुर्गम से दुर्गम क्षेत्रों में पशुओं के इलाज के लिए न केवल चिकित्सक पहुंच रहे हैं, बल्कि विभाग की ओर से पालकों को सरकारी योजनाओं से लाभान्वित करने के लिए अभियान स्तर पर कार्यक्रमों के आयोजन कर उनको जोडऩे का काम किया जाता रहा है। पहले कई बीमारियों का पता नहीं चलता था, और पशुओं की मौत हो जाती थी, लंपी इसका ज्वलंद उदाहरण रहा है कि पशु चिकित्सकों ने इस महामारी को किस प्रकार से मात दी है। महामारी के दौरान चिकित्सक ऐसे-ऐसे क्षेत्रों में पहुंचे, जहां पर गाड़ी तक नहीं जा सकती थी।

कहां, कितने गोवंश
क्षेत्र गोवंश संख्या
डेगाना 52690
डीडवाना 53434
जायल 44677
खींवसर 49166
लाडनू 33181
मकराना 30646
मेड़ता 70439
नागौर 79343
नावां 57087
परबतसर 30927

पालकों को इन येाजना का मिल रहा लाभ
पशुपालन विभाग के अनुसार पशु पालकों को उष्ट संरक्षण योजना, राष्ट्रीय कृतिम गर्भाधान कार्यक्रम, मुख्यमंत्री नि:शुल्क दवा वितरण, ब्रुसेला नियंत्रण कार्यक्रम, खुरपका-मुंहपका रोग नियंत्रण कार्यक्रम एवं कामधेनु बीमा योजना से लाभान्वित करने का काम किया गया है। इन बीमारियों में कई तो ऐसी हैं कि पूर्व में इनके चलते काफी संख्या में मर जाते थे, लेकिन अब ऐसा बिलकुल नहीं रहा है। अधिकारियों का कहना है कि पशुपालन में अब काफी सुधार आ चुका है।
नागौर. विश्व पशु कल्याण दिवस मनाए जाने के 98 साल बाद भी पशुओं की यह है हालत

You received this email because you set up a subscription at Feedrabbit. This email was sent to you at abhijeet990099@gmail.com. Unsubscribe or change your subscription.