दिव्यकृति सिंह राठौड़, संडे गेस्ट एडिटर
जयपुर. मेरे तीनों घोड़े मेरे सच्चे साथी हैं। मेरा ज्यादातर टाइम इन्हीं के साथ रहता है। पिछले दो साल से घर से दूर जर्मनी में प्रेक्टिस कर रही हूं, आसान नहीं हैं, घर से दूर रहकर खुद को मजबूत रखना। बचपन से पैरेंट्स ने आगे बढ़ाया है। मेरे पापा विक्रम सिंह राठौड़ पोलो खेलते थे, तो घुड़सवारी मुझे विरासत में मिली है। हालांकि घोड़ों से लगाव कॉलेज में रहा, वहां से मैंने घुड़सवारी सीखी और इसी को कॅरियर के रूप में चुन लिया।
मैंने अपनी असफलताओं से सीखा है
घुड़सवारी में अब लड़कियां भी आगे आ रही हैं। हालांकि बहुत महंगा खेल है, इसमें महिला और पुरुष दोनों साथ खेलते हैं। शुरुआत में मेरे सामने कई तरह की चुनौतियां आईं। असफलता मिली, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। जब आप सफल होते हैं, तो सब साथ होते हैं, लेकिन जब असफल होते हैं तो परिवार का साथ ही आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। माता-पिता को बच्चों की असफताओं को स्वीकार करके आगे बढ़ना सिखाना चाहिए।
पापा ने मेरे मन की बात सुनी और मैं खेलने लगी
ललित पी. शर्मा
जयपुर. कहते हैं कि गर हौसले हो बुलंद तो हर मंजिल आसां हो जाती है, इन पंक्तियों को सच कर दिखाया है सीकर के गांव सावलोदा लाडखानी की पूजा कंवर ने। खेतों में पंछियों को उड़ाने वाली पूजा आज हैंडबॉल में टीम इंडिया से खेल रही हैं। उन्होंने हांगझाऊ एशियन गेम्स में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया। वह गोवा में हुए नेशनल गेम्स में राजस्थान की टीम की कप्तान रही थीं। पूजा ने हैंडबॉल के कई टूर्नामेंट्स में अपना बेहतर प्रदर्शन किया है।
गांव वालों ने कहा, बेटी को बाहर मत भेजो
पूजा ने बताया कि जब वह 9 साल की थी तभी उन्होंने खिलाड़ी बनने का निश्चय किया। गांव वालों ने कहा कि बेटी को घर से बाहर नहीं निकालना चाहिए। लेकिन पापा ने उनके मन की बात सुनी और उन्हें खेलों में आगे बढ़ाया। आर्थिक तंगी ेके बीच भी पापा ने नहीं रोका। सवाई मानसिंह स्टेडियम में कोच मनीषा राठौड़, तेजराज और प्रियदीप ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
स्कूल के रास्ते पैदल चलकर रेस वॉकिंग को बनाया लक्ष्य
अरुण शर्मा
झुंझुनूं. उदयपुरवाटी उपखंड के मावता गांव के किसान की बेटी दीपिका शर्मा ने भी अभावों में रहते हुए रेस वॉकिंग में नेशनल लेवल पर खास पहचान बनाई है। दीपिका को बचपन से ही खेलों में रुचि थी। गांव से 5 किमी पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता था। इसी में उसने खेल ढूंढा और पैदल चाल (रेस वॉकिंग) खेल को अपना लक्ष्य बना लिया। दीपिका ने जिला, स्तर और नेशनल स्तर पर खेल कर मुकाम हासिल किया।
बेटी के सपनों को पूरा करने के लिए पिता ने छोड़ा घर
दीपिका के पैरेंट्स कैलाश शर्मा और सुनीता गांव में खेती-बाड़ी का कार्य करते थे। बेटी को खेल में आगे बढ़ाने के लिए वह गांव छोड़कर जयपुर चले गए। वहां पर पिता ने प्राइवेट नौकरी शुरू की। दीपिका ने 10 किलोमीटर पैदल चाल में नेशनल स्तर पर गुवाहाटी और संगरूर में कांस्य पदक जीते हैं और रांची में स्वर्ण पदक जीता है।