मानव अधिकार वह अधिकार है जो मानव में मानव होने के नाते अन्तर्निहित है और एक मानव के व्यक्तित्व के पूर्ण विकास एवं गरिमामय जीवन के लिए आवश्यक है। मानवधिकार वेे न्यूनतम अधिकार हैं, जो प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यक रूप से प्राप्त होने चाहिए, क्योंकि वह मानव परिवार का सदस्य है। ये मनुष्य की प्रकृति में विहित हैं और किसी राज्य, शासक, रूढि़ या किसी अन्य संख्या की देन नहीं है, इसलिए मानव अधिकार को जन्मजात अधिकार या नैर्सिक अधिकार भी कहा जाता है। मानव अधिकार पद का प्रयोग सर्वप्रथम अमरीकन राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने 16 जनवरी 1941 में काग्रेंस के संबोधन में किया था। मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 2 (घ) के अनुसार 'मानव अधिकार' से जीवन, स्वतंत्रता, समानता और व्यक्ति की गरिमा से संबंधित ऐसे अधिकार अभिप्रेत हैं, जो संविधान की ओर से प्रत्याभूत किए गए हैं या अन्तरराष्ट्रीय प्रसंविदाओं से सन्निविष्ट और भारत में न्यायालयों की ओर से प्रर्वतनीय है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार संरक्षण का उदय 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना से शुरू हुआ तथा इस कड़ी में महत्वपूर्ण प्रयास संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा 10 दिसम्बर 1948 को मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा (यूडीएचआर) से प्रारम्भ हुआ, इसलिए 10 दिसम्बर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार के रूप में मनाया जाता है। हालांकि मानवाधिकार दिवस लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए मनाया जाता है, लेकिन आज 75 साल बाद भी यह दिन इस लिहाज से प्रासंगिक प्रतीत होता है कि लाखों की संख्या में लोगों को उनके मानवाधिकार नहीं मिल रहे हैं। अशिक्षित क्षेत्रों में इनका हनन जारी है। आज हमारे बीच कई ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो न्याय के लिए वर्षों से भटक रहे हैं तो जेलों में बंद कैदियो की अमानवीय दशा, भ्रष्टाचार, महिलाओं का शोषण एवं उत्पीडऩ मानवाधिकारों पर प्रश्न चिह्न खड़े कर रहे हैं।
एक साल में 80 हजार से अधिक मामले
इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपनी स्थापना के बाद से पिछले 30 वर्षों में आयोग ने 22.48 लाख से अधिक मामले दर्ज किए हैं, जिनमें 22.41 लाख से अधिक मामलों का निपटारा किया और मानव अधिकार उल्लंघन के पीडि़तों को राहत के रूप में 230 करोड़ रुपए से अधिक के भुगतान की सिफारिश की। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक वर्ष के दौरान एक दिसम्बर, 2022 से 30 नवम्बर, 2023 तक आयोग ने 80,376 मामले दर्ज किए, जिनमें स्वत: संज्ञान के 117 मामले शामिल हैं।
मानव अधिकारों का पोषक रहा है भारत
भारत सदैव से ही मानव अधिकारों का पोषक रहा है। 'वसुधैव कुटम्बकम' और 'जियो और जीने दो' जैसी मानवतावादी विचारधाराओं का प्रादुर्भाव सबसे पहले भारत में हुआ। विश्व शांति का पक्षधर भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का सक्रिय सदस्य रहा। भारतीय संविधान में उन सभी आदर्शों, विचारों, मूत्यों को अंगीकार किया गया जो, मानवाधिकारों के यूएन चार्टर में है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में मानवाधिकारों के संरक्षण के आदर्श निहित हैं। भारतीय न्यायपालिका में भी मानवाधिकारों के संरक्षण के सजग प्रहरी के रूप में सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर मानवाधिकार संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं।
मानवाधिकारों की चुनौतियां
- विश्व स्तर पर युद्ध एवं नरसंहार।
- गरीबी और कुपोषण एवं भूखमरी।
- आंकतवाद।
- महिलाओं का शोषण एवं उत्पीडऩ।
- बालश्रम और बाल उत्पीडऩ व तस्करी।
- भ्रष्टाचार व अशिक्षा।
- जेलों में बंद कैदियों की अमानवीय दशा।
- किसानों की ओर से आत्म हत्या करना।
इसकी है आवश्यकता
- शिक्षा का प्रसार।
- मानवतावादी विचारधारा का विकास।
- मानवाधिकारों के क्रियान्वयन करने वाली संस्थाओं को प्रशिक्षित करने दी।
- मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए पारित अन्तरराष्ट्रीय अभिसमयों व राष्ट्रीय-विधानों में किए गए प्रावधानों का यथार्थ में क्रियान्वयन।
- मानवधिकारों के संरक्षण की दिशा में किए गए प्रयासों में और अधिक धार लाने की आवश्यकता है, जो निस्संदेह मानव अधिकार संरक्षण में मील का पत्थर साबित होंगे।