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खरीद केन्द्र के माध्यम से किसानों से हो चुकी है एक करोड़ 28 लाख 45 हजार 625 रुपए की मूंग खरीद
-कृषि मंडी की खुली नीलामी में अब काश्तकारों की चहल-पहल हुई कम, समर्थन मूल्य केन्द्र पर बढ़ी भीड़
नागौर. कृषि उपजमंडी की खुली नीलामी में मूंग के भावों में लगभग समानांतर की स्थिति होने से समर्थन मूल्य खरीद केन्द्र पर किसानों की भीड़ बढ़ गई है। मंडी की खुली नीलामी में मूंग का भाव जहां 8600 सौ रुपए प्रति क्विंटल है, वहीं समर्थन मूल्य केन्द्र में 8558 रुपए प्रति क्विंटल की दर से मूंग खरीदी जा रही है। भावों में ज्यादा अंतर नहीं होने के चलते काश्तकारों में मूंग की उपज को समर्थन मूल्य केन्द्र पर बेचने की होड़ लगी हुई है। इसकी वजह से कृषि उपज मंडी में समर्थन मूल्य केन्द्र के मार्फत अब तक करीब डेढ़ हजार काश्तकारों की से मूंग की उपज खरीदी जा चुकी है। काश्तकार अब तक 22 करोड़ से ज्यादा की मूंग समर्थन मूल्य के पेटे बेचान कर चुके हैं। स्थिति यह है कि कृषि उपज मंडी में समर्थन मूल्य के लिए निर्धारित यार्ड मूंग भरे कट्टों से अटे पड़े हुए हैं। खरीद केन्द्र के अधिकारियों का कहना है कि अब तक 44 हजार से ज्याद मूंग के कट्टे भी वेयर हाउस में जमा किए जा चुके हैं। साढ़े नौ हजार से ज्यादा मूंग से भरे कट्टे यार्ड में रखे हुए हुए हैं। इनको भी वेयर हाउस में जल्द ही जमा करा दिया जाएगा।
कृषि उपज मंडी में चल रही समर्थन मूल्य केन्द्र पर किसानों की चहल-कदमी बढ़ गई है। प्रतिदिन तकरीबन अस्सी से नब्बे काश्तकारों के मूंग की खरीद होने से पूरा यार्ड भरा नजर आने लगा है। हालांकि खरीद तो एक नवंबर से शुरू हो चुकी है, लेकिन समर्थन मूल्य केन्द्र पर मूंग की खरीद में तेजी मंडी की खुली नीलामी में भाव गिरने के बाद आई है। करीब एक माह पूर्व मूंग का भाव साढ़े आठ हजार रुपए प्रति क्विंटल की दर का आंकड़ा पार कर गया था। इसकी वजह से मंडी की खुली नीलामी में मूंग बेचने की होड़ लगी हुई थी। इसके बाद भाव गिरे तो स्थिति बदल गई। अब खुली मंडी में मूंग बेचने की जगह समर्थन मूल्य केन्द्र पर इसे बेचने के लिए काश्तकारों की भीड़ बढऩे लगी है। इसके चलते अब तक लाभान्वित हुए किसानों की संख्या का आंकड़ा 1400 की संख्या पार कर गया है। अब स्थिति यह हो गई है कि समर्थन मूल्य केन्द्र पर मूंग बेचान के लिए अब रोजाना करीब सौ किसानों को बुलाया जा रहा है। जबकि महज एक माह पूर्व ही यह संख्या पांच या छह काश्तकारों की हुआ करती थी। यही वजह रही कि शनिवार को कृषि उपजमंडी में समर्थन मूल्य केन्द्र पर मूंग बेचने आए किसानों के ट्रेक्टरों की लाइन लगी नजर आई।
इनके भाव औसत रहे, बाजार में तेजी नहीं
कृषि उपजमंडी में इन दिनों केवल मूंग की ढेरियां ही परिसर में नजर आ रही हैं। जबकि जीरा, सौंफ, ग्वार एवं सरसों और मोठ के बाजार में लगभग सन्नाटा की स्थिति बनी हुई है। जीरा का भाव महज पंद्रह दिनों के अंतराल में जीरा का भाव करीब दो हजार रुपए प्रति क्विंटल गिरा है। इसके पहले जीरा 33 हजार से 34 हजार प्रति क्विंटल बिक रहा था, लेकिन शनिवार को जीरा 31 हजार रुपए प्रति क्विंटल बिका। व्यापारियों की माने तो अब जीरा की केवल सौ से डेढ़ सौ बोरियां ही मंडी में आ रही है। जबकि सीजन में आठ से नौ हजार बोरियां आ रही थी। इसी तरह से सौंफ, सरसों, ज्वार एवं तारामीरा की स्थिति बनी हुई है। इनके भावों में पिछले एक माह के दौरान कोई विशेष अंतर नहीं आया। कृषि उपजमंडी के व्यापारी पवन भट्टड़ का कहना है कि अब सीजन की फसल आने के बाद ही मंडी के कारोबार में तेजी आएगी।
एक नजर इस पर
समर्थन मूल्य पर मूंग के कुल कट्टों की संख्या-53622
समर्थन मूल्य केन्द्र पर खरीदी गई कुल मूंग-26811 क्विंटल
समर्थन मूल्य केन्द्र में लाभान्वित हुए किसानों की संख्या-1401
समर्थन मूल्य पर अब तक खरीदी गई मूंग की लागत-22 करोड़ 94 लाख 48 हजार 538 रुपए
समर्थन मूल्य केन्द्र की ओर से वेयर हाउस में जमा कट्टे-44012
समर्थन मूल्य के प्लेटफार्म पर एकत्रित मूंग से भरे कुल कट्टे-9610

काश्तकार बोले: भाव अच्छा मिल रहा है
समर्थन मूल्य केन्द्र में मूंग को भाव अच्छे मिल रहे हैं, लेकिन इसको और बढ़ाना चाहिए। ऐसा होता तो फिर काश्तकारों को ज्यादा फायदा होता।
बाबूलाल जांगीड़, काश्तकार
समर्थन मूल्य एवं मंडी की खुली नीलामी में भाव का ज्यादा अंतर नहीं है, लेकिन सरकार को तुरन्त पैसे दिलाने की व्यवस्था करनी चाहिए। इससे किसानों को लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
रामजीवन, काश्तकार
मूंग ही नहीं, बल्कि प्रत्येक फसल को समर्थन मूल्य के दायरे में सरकार को लाना चाहिए। इससे काश्तकारों को ज्यादा दिक्कतें नहीं होगी। इसका भाव भी और बेहतर करना चाहिए।
सुरेश मुण्डेल, काश्तकार

कहीं ज्यादा खर्च के बाद भी चुनाव हार गए तो कहीं कम खर्च के साथ भी जीत का परचम फहराया। कोई ऐसा भी रहा जिसने ज्यादा वोट तो पाए पर खर्च भी ज्यादा किया। नागौर जिले की दस विधानसभा सीट पर चुनावी खर्च का ब्योरा प्रस्तुत किया तो यही हकीकत सामने आई। हकीकत में खर्च का आकलन तो कैसे हो, यह आंकड़े वो हैं जो प्रत्याशियों की ओर से प्रस्तुत किए गए हैं। मेड़ता से कांग्रेस प्रत्याशी शिवरतन वाल्मीकि सबसे खर्चीले प्रत्याशी रहे। उन्होंने सर्वाधिक 35 लाख 29 हजार 889 रुपए खर्च किए। खर्च के मामले में दूसरे नंबर पर मकराना विधानसभा सीट से चुनाव जीते कांग्रेस के जाकिर हुसैन गैसावत तो नावां विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी महेंद्र चौधरी रहे।

चुनाव का परिणाम आए एक महीने से अधिक हो गए। चुनाव के दौरान खर्चे को लेकर प्रत्याशियों पर हमेश अंगुली उठती रही है। चुनाव आयोग की बंदिश और खर्च का सिलसिलेवार विवरण देना भी अब अति आवश्यक हो गया है। कांग्रेस/भाजपा के साथ अन्य दलों के ही नहीं निर्दलीय प्रत्याशियों ने अपना भाग्य आजमाया। हालांकि खर्च के लिहाज से ब्योरा पेश करने वाले कई विजयी कंजूस से नजर आए। कुछ निर्दलीय ने चंद हजारों में अपना काम चलाया। राजनीतिक दल के कई प्रत्याशियों ने पार्टी से मिली मदद का भी ब्योरा दिया है।

प्रत्याशियों की ओर से दिए गए खर्च पर नजर डालें तो नागौर (डीडवाना-कुचामन) जिले की दस विधानसभा सीट में से मेड़ता सिटी पर कांग्रेस प्रत्याशी शिवरतन वाल्मीकि ने 35 लाख 29 हजार 889 रुपए खर्च किए जो जिले में सर्वाधिक हैं। जबकि उनको हराने वाले भाजपा प्रत्याशी लक्ष्मण राम ने 28 लाख 34 हजार 397 रुपए ही खर्च किए। तीसरे स्थान पर आई रालोपा की इंदिरा बावरी ने तकरीबन साढ़े नौ लाख में ही पूरा चुनाव लड़ लिया।

मकराना विधानसभा सीट से चुनाव जीते कांग्रेस के जाकिर हुसैन गैसावत ने चुनाव खर्च 34 लाख 48 हजार 30 रुपए बताया जबकि उनके मुकाबले में भाजपा प्रत्याशी सुमिता भींचर ने भी खर्च खूब किया। उनका यह खर्च करीब 31 लाख 32 हजार रुपए रहा। इसी तरह नावां सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी महेंद्र चौधरी ने चुनाव पर करीब 33 लाख रुपए खर्च किए जबकि यहां से जीत दर्ज कराने वाले भाजपा के विजय चौधरी ने इनके मुकाबले करीब 24 लाख 89 हजार रुपए खर्च किए यानी महेंद्र चौधरी के मुकाबले आठ लाख रुपए कम।

यहां भी जीतने वालों का कम खर्च

नागौर विधानसभा क्षेत्र से हारी भाजपा प्रत्याशी ज्योति मिर्धा ने चुनाव पर करीब 26 लाख 85 हजार रुपए खर्च किए जबकि उन पर जीत दर्ज कराने वाले कांग्रेस के हरेंद्र मिर्धा ने महज 18.91 लाख रुपए खर्च किए। तीसरे स्थान पर रहे निर्दलीय हबीबुर्रहमान ने 9.82 लाख रुपए खर्च किए। निर्दलीय सुरेंद्र दौतड़ ने भी 4.58 लाख रुपए बहाए। इसी तरह खींवसर विधानसभा का चुनाव भी खर्च के मामले में कम रोचक नहीं है। यहां वोटों के भारी अंतर से हारने वाले कांग्रेस के तेजपाल मिर्धा ने करीब साढ़े 29 लाख रुपए जबकि भाजपा के रेंवतराम डागा ने 27 लाख 59 हजार 836 रुपए खर्च किए। यहां से चुनाव जीतने वाले रालोपा के हनुमान बेनीवाल ने महज 17 लाख 30 हजार 828 रुपए खर्च किए। एक अन्य निर्दलीय प्रत्याशी दुर्गसिंह ने दस लाख बीस हजार रुपए चुनावी व्यय का ब्योरा दिया है। परबतसर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतने वाले कांग्रेस प्रत्याशी रामनिवास गावडिय़ा का खर्च सिर्फ दस लाख 28 हजार 333 रहा जबकि चुनाव हारने वाले भाजपा के मानसिंह किनसरिया ने 17 लाख 89 हजार से अधिक खर्च किए।

निर्दलीय ने सर्वाधिक खर्च कर जीत हासिल की

डीडवाना विधानसभा सीट से निर्दलीय यूनुस खान ने 29 लाख 83 हजार रुपए से अधिक खर्च कर जीत हासिल की। उनके मुकाबले में भाजपा के जितेंद्र सिंह लोधा ने 26 लाख 19 हजार तो कांग्रेस के चेतन सिंह चौधरी ने 21 लाख 56 हजार रुपए खर्च किए। जायल सीट पर भाजपा की मंजू बाघमार ने 26 लाख 53 हजार रुपए खर्च किए जबकि उनके सामने हारने वाली कांग्रेस की मंजू मेघवाल ने इनसे आधे 12 लाख 90 हजार रुपए खर्च किए। यहां रालोपा के बीएल भाटी ने करीब सात लाख खर्च किए। डेगाना विधानसभा सीट से भाजपा के अजय सिंह किलक ने 17 लाख 68 हजार रुपए खर्च किए जबकि कांग्रेस के विजय पाल मिर्धा ने 15 लाख 14 हजार रुपए। यहां रालोपा के लक्ष्मण सिंह मुवाल ने 8 लाख 64 हजार रुपए बहाए। लाडनूं से कांग्रेस के मुकेश भाकर ने 18 लाख 80 हजार रुपए खर्च कर भाजपा के करणी सिंह पर जीत हासिल की। करणी सिंह ने चुनाव में बीस लाख 14 हजार से अधिक खर्च किए थे।

हजारों में ही सिमट गए

चुनाव खर्च का ब्योरा देने वाली बसपा-आप ही नहीं अन्य पाटियों के अलावा निर्दलीय प्रत्याशियों का हिसाब-किताब कोई खासा नहीं था। कुछ हजारों से दो-ढाई लाख तक में अधिकाधिक प्रत्याशी ने चुनाव लड़ लिया। कुछ निर्दलीय प्रत्याशियों ने खर्च की सीमा जरूर बढ़ाई । हर विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में खड़े होने वाले एक या दो प्रत्याशियों पर यह आरोप जरूर लगा कि किसी प्रत्याशी को हराने अथवा जिताने के लिए समझौते के तहत वे ऐसा कर रहे हैं। यह भी सुनने को मिला कि उनके फाइनेंसर भी कोई और हैं।

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