>>: Rajasthan News : दाह संस्कार में न हो ब्लास्ट, इसलिए निकाले 151 पेसमेकर

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गजेंद्र सिंह दहिया
डॉ सम्पूर्णानंद मेडिकल कॉलेज के अधीन संचालित महात्मा गांधी अस्पताल में ऑपरेशन थियेटर के इंचार्ज नर्सिंग ऑफिसर अरविंद अपूर्वा अब तक 151 मृत शरीर से कृत्रिम पेसमेकर निकाल चुके हैं। वे बीते 27 साल से यह काम नि:शुल्क कर रहे हैं। इनमें 2 स्वाइन फ्लू रोगी भी शामिल है जब 2009-10 में स्वाइन फ्लू चरम पर था। वर्ष 2020-21 में कोविड बीमारी के समय भी बगैर डरे 14 कोविड रोगियों के मृत शरीर से पेसमेकर निकाला था। पेसमेकर हृदय गति नियंत्रित करता है। सामान्य हृदय गति 72 स्पंदन प्रति मिनट है। कम्पलीट हार्ट ब्लॉक बीमारी में हृदय गति 40 स्पंदन प्रति मिनट से कम हो जाती है, तब कृत्रिम पेसमेकर लगाया जाता है जो माचिस की डिब्बी के आकार का होता है। यह छाती में गर्दन के थोड़ा नीचे क्लेविकल हड्डी में लगता है, जहां खाली जगह होती है।

 

3 इंच का चीरा लगाकर निकालते हैं


अरविंद ने बताया कि कृत्रिम पेसमेकर लगे व्यक्ति की मृत्यु के बाद वे उनके घर या अस्पताल में पहुंचकर तीन इंच का चीरा लगाकर पेसमेकर बाहर निकाल देते हैं। उसके बाद हृदय को जाने वाली एक फीट लम्बी लीड भी निकालते हैं।

 

2 दाह संस्कार में हुए विस्फोट, लकडि़यां व लाश उछली


कृत्रिम पेसमेकर में एक ड्राई बैटरी होती है जो 10-12 साल चलती है। पेसमेकर नहीं निकालने पर बैटरी की वजह से दाह संस्कार के समय लाश में विस्फोट हो सकता है। अरविंद बताते हैं कि उन्होंने दो ऐसे मामले देखे जब लाश में विस्फोट हुआ और लकडि़यां बिखर गई। एक मामले में अहमदाबाद में रोगी की मौत के बाद यहां सिवांची गेट श्मशान में दाह संस्कार के समय ऐसा हुआ। दूसरा मामला पीपाड़ सिटी में आया।

 

6 साल की बच्ची में पेट में था


अरविंद ने बताया कि एक छह साल की बच्ची के पेसमेकर निकालते समय समस्या हुई थी क्योंकि उसके क्लेविकल हड्डी में जगह नहीं होने पर डॉक्टर ने पेट यानी एब्डोमन केविटी में पेसमेकर लगाया था। बच्ची का एक्स-रे देखने के बाद ही उसका पता चला।

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परिजन भूल जाते हैं इसलिए 38 बार श्मशान गए


व्यक्ति की मृत्यु के बाद कई बार भावनाओं में लोग कृत्रिम पेसमेकर निकालना भूल जाते हैं। ऐसे में अरविंद ने 38 लाशों से पेसमेकर श्मशान जाकर निकाले हैं।


नैतिकता के तौर पर मृत शरीर से प्रोसिजर के बाद फीस लेना सही नहीं है, इसलिए 27 साल से मैं यह कार्य नि:शुल्क कर रहा हूं।
अरविंद अपूर्वा, नर्सिंग ऑफिसर, महात्मा गांधी अस्पताल, जोधपुर

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