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वादियों में सैर करने कश्मीर से लेकर अफ्रीका तक से आते हैं पक्षी...पढ़े पूरी खबर Friday 29 March 2024 05:35 AM UTC+00 अरावली क्षेत्र के पक्षीविद् शत्रुंजय सिंह बताते हैं कि स्थानीय परिवेश में पक्षी दो तरह के होते हैं गैर प्रवासी पक्षी और प्रवासी पक्षी। ये हमारे स्थानीय परिवेश में रहते हैं और प्रवजन नहीं करते हैं, जैसे मैना, बुलबुल, टेलरबर्ड, वेबलर, बत्तख और प्रवासी पक्षी कोमन टील नॉर्दर्न सबलर, पिनटेल, गिद्ध, बार हेडेडगूज आदि। स्थाई प्रवासी पक्षी कनारी इसकेचर जल कागली, स्नैक बर्ड, घरट इसे पेलिकन भी कहते हैं, जो गुजरात से आते हैं। लेसर विसलिंग टील रात्रि में भोजन करती है। यह झीलों व तालाबों के आसपास पाई जाती है और दो स्वर में आवाज निकालती है। शत्रुंजय बताते हैं कि हमें विरासत में मिले प्राकृतिक ज्ञान और पक्षियों की पहचान, उनके निवास, खाने-पीने के तरीकों व मौसम के अनुकूल उनकी मौजूदगी की जानकारी रखनी होगी। वह बताते हैं कि पक्षी अलग-अलग प्रकार के होते हैं, जिनमें पेड़ पर रहने वाले, पानी के तीर पर रहने वाले, पानी के अंदर रहने वाले और भोजन के आधार पर भी इन्हें पहचाना जाता है। कुछ पेड़ों पर भोजन करते हैं, कुछ जमीन पर रहकर, कुछ पानी के किनारे व कुछ पानी के अंदर भोजन करते हैं। इन्हीं विशेषताओं के आधार पर हम इन्हें पहचान सकते हैं। पक्षियों की पहचान उनकी आवाज व उड़ान के आधार पर भी होती है। एक नई चिडिय़ा, जो आती है दक्षिण अफ्रीका से मौजूदा महीने में जंगल में पानी की बहुत कमी है। पक्षियों को पानी चाहिए। जंगल में छोटे-छोटे वॉटरहाल बनाने चाहिए। शत्रुंजय कहते हैं कि वन विभाग को पक्षी दर्शन कार्यक्रम रखना चाहिए, जिससे आमजन में इनके संरक्षण के प्रति लगाव उत्पन्न हो। प्रतिदिन अपने पसंदीदा स्थान पर पक्षियों को देखने के लिए समय व्यतीत करें और उनको पहचानने की कोशिश करें। देवगढ़ राघव सागर तालाब पर करीब 48 प्रजातियों के पक्षी देखे जा सकते है। |
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