>>: जब कांग्रेसी प्रत्याशी के एक जुमले से हार गए थे भाजपा के दिग्गज नेता भैरोसिंह, बेहद रोचक था ये लोकसभा चुनाव

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Lok Sabha Election 2024 : बाड़मेर में 1971 के चुनावों में जोधपुर से आए अमृत नाहटा ने सपने दिखाए कि मुझे वोट दीजिए बाड़मेर में अंगूर की खेती करवाऊंगा। उनका यह जुमला ऐसा चला कि कांग्रेस से अलग होकर बनी कांग्रेस जगजीवनराम के प्रत्याशी अमृत नाहटा जीत गए। उन्होंने हराया भी जनसंघ के दिग्गज नेता भैरोसिंह शेखावत को। जनसंघ के दिग्गज नेता भैरोसिंह शेखावत ने एक बार बाड़मेर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा। यह तब था जब यहां कांग्रेस के दो फाड़ हुए। एक कांग्रेस जगजीवनराम और दूसरी पुरानी कांग्रेस। जनसंघ ने भैरोसिंह शेखावत को यहां से चुनाव लड़ाया। अमृत नाहटा जोधपुर से आए थे और इससे पहले चुनाव जीत चुके थे। 1971 में उन्होंने एक जुमला गढ़ लिया कि बाड़मेर में अंगूर की खेती हो सकती है, जबकि तब यहां पीने के पानी के भी लाले थे। न तो कोई नजदीक नहर थी और न ही भूमिगत पानी। प्यासे लोगों को इंदिरा गांधी नहर को बाड़मेर लाने और यहां खेती के लिए पानी की बात की तो बड़ा बदलाव आ गया। अमृत नाहटा जीत गए।

50,573 वोटों से हारे भैरोसिंह
लोकसभा का पांचवां चुनाव मध्यावधि हुआ। एक से 6 मार्च 1971 तक यह चुनाव चला। बाड़मेर लोकसभा सीट के लिए 1 मार्च को चौहटन, शिव, जैलसमेर एवं शेरगढ़ विधानसभा क्षेत्र और 6 मार्च 1971 को सिवाना (सुरक्षित) एवं पचपदरा विधानसभा क्षेत्र में मतदान हुआ। इस चुनाव में बाड़मेर जिले की छह विधानसभा क्षेत्र के 240737, जैसलमेर जिले के एक विधानसभा क्षेत्र के 34427 एवं एक जोधपुर जिले के एक शेरगढ़ विधानसभा क्षेत्र के 31362 मतदाता थे। लोकसभा के इस मध्यावधि चुनाव के समय कांग्रेस में विभाजन होने पर कांग्रेस(ज) जगजीवनराम एवं कांग्रेस पुरानी के नाम से परिचय में आई। इस चुनाव में बाड़मेर लोकसभा सीट के लिए कांग्रेस(ज) के अमृत नाहटा, जनसंघ के भैरोसिंह शेखावत, कांग्रेस के जहूर अहमद, निर्दलीय हकीकुतल्लाखां एवं निर्दलीय हरिराम ने चुनाव लड़ा। चुनाव में कांग्रेस(ज) के अमृत नाहटा को 166605, जनसंघ के भैरोसिंह शेखावत को 116032, कांग्रेस के जहूर अहमद को 6829, निर्दलीय हकीकुतुल्ला खां का 3352 एवं निर्दलीय हरिराम को 2909 मत मिले। कांग्रेस (ज) के अमृत नाहटा ने जनसंघ के भैरोसिंह शेखावत को 50,573 मतों से पराजित किया।

अंगूर देखे ही नहीं थे लोगों ने
सच मानिए 1971 का वह जमाना था जब परिवहन के साधन कम थे। पानी भी नहीं था। यहां पर फल तो गिनेचुने आते थे। तब आधी से ज्यादा आबादी ने अंगूर नाम ही सुना था, देखे भी नहीं थे। बरसाती फसलें होती थी। दस में से 07 अकाल पड़ते थे। ऐसे में जब अंगूर के सपने दिखाए तो यह जुमला खूब चल पड़ा। ऐसा भी नहीं है कि वोट इसी कारण पड़े लेकिन तब नारों और जुमलों का प्रचार-प्रसार ऐसा होता था कि फिर वही एक बात पूरे इलाके में घूमती रहती थी।
- कानसिंह राजपुरोहित, बीसू

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