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हर दस हजार में से एक बच्चा स्पाइनल मस्कुलर एट्रोपी से पीड़ित Friday 05 January 2024 06:02 AM UTC+00 जयपुर। प्रदेश में स्पाइनल मस्कुलर एट्रोपी के मामले सामने आ रहे है। हालांकि यह अब तक स्पष्ट नहीं है कि कितनी संख्या में एसएमए के पीड़ित बच्चे है। लेकिन हर दस हजार में से एक बच्चे को यह बीमारी होती है। ऐसे में यह दुर्लभ बीमारी जानलेवा है। इस बीमारी के एक्सपर्ट डॉक्टर प्रियांशु माथुर ने बताया कि इस बीमारी का समय रहते मालूम चल जाए तो इलाज हो बच्चे को बचाया जा सकता है। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है। क्योंकि समय रहते यह बीमारी डायग्नोस नहीं हो पा रही है। जब तक बच्चों में इस बीमारी के बारे में परिजनों या डॉक्टरों को मालूम चलता है, तब तक वह लेट हो जाते है। जिसके बाद इसका इलाज महंगा हो जाता है। यहां तक की करोड़ों रुपए में इसका इलाज का खर्च हो सकता है। स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी एक जानलेवा दुर्लभ रोग है, जो स्पाइनल कॉर्ड के मोटर न्यूरॉन्स पर असर डालता है। इससे मांसपेशियाँ कमजोर हो जाती हैं और धीरे-धीरे चलना-फिरना बंद हो जाता है। एसएमए में मोटर न्यूरॉन्स धीरे-धीरे खत्म होते जाते हैं, जिससे मरीजों की चलने-फिरने की क्षमता और शरीर के जरूरी काम प्रभावित होते हैं। इनमें हिलने-डुलने, सांस लेने, निगलने, आदि में कठिनाई शामिल है। कई बच्चे तो दूसरा जन्मदिन भी नहीं देख पाते.. मरीजों में एसएमए का पता लगाना मुश्किल हो सकता है। सही समय पर पता न चलने के कारण कई पीड़ित बच्चे तो अपने दूसरे जन्मदिन तक जीवित नहीं रह पाते हैं। मरीजों को होने वाली विभिन्न चुनौतियों के साथ-साथ उनके परिजन और देखभाल करने वाले लोग भी कई संघर्षों तथा कठिनाइयों का अनुभव करते हैं। यह आनुवांशिक रोग, ऐसे बचा जा सकता है.. एसएमए एक आनुवांशिक रोग है। इसलिये पैरेंटहुड चाहने वाले कपल्स को अपने परिवार की और मेडिकल हिस्ट्री पर चर्चा करना चाहिए। खासकर एसएमए जैसे आनुवांशिक रोगों के बारे में विचार करना जरूरी है। इसके अलावा कैरियर टेस्टिंग से यह पता चल सकता है कि उन्हें एसएमए जैसा कोई जीनेटिक म्युटेशन तो नहीं है। अगर दोनों पैरेंट्स ही कैरियर्स हैं तो संभावित रोग पर जरूरी जानकारी से सशक्त होने के उपाय कर सकते हैं। और अगर उनके बच्चे को एसएमए हो तो चिकित्सा एवं देखभाल की व्यवस्था कर सकते हैं। |
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