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Lost the sight of one eye in car service : अयोध्या में मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठा के साथ ही ककराना गांव के कार सेवक 64 वर्ष के गोविंद राम कुमावत की प्रतिज्ञा भी पूरी हो जाएगी। कार सेवा के दौरान एक आंख की रोशनी गंवा चुके कुमावत ने 1992 में यह प्रण किया था कि जब तक अयोध्या में राम मंदिर नहीं बन जाएगा, तब तक वह बाल नहीं कटवाएंगे। कुमावत ने मंदिर का शिलान्यास हुआ, तब गांव के बालाजी मंदिर में बाल कटवाए थे। अब 22 जनवरी को मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा के बाद बाल कटवाएंगे। गोविंद राम कुमावत ने बताया कि 24 अक्टूबर 1990 में वह 46 कार सेवकों के जत्थे के साथ रवाना हुए थे। जैसे तैसे वह मनकपुर रेलवे स्टेशन तक पहुंचे थे। वहीं से पैदल के रास्ते से रवाना हुए। इस दौरान उन्हें जंगलों व गन्नों के खेतों में छुपाना पड़ा। रात्रि में चलते थे और दिन में गन्नों के खेतों में छुप कर रहते थे। ऐसे करके 31 अक्टूबर को सरयू पुल पर पहुंचे। तीन-चार दिन कार सेवा के बाद पुलिस के लाठी चार्ज में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। उनके आंख में चोट लगने से एक आंख की रोशनी चली गई। उन्हें फैजाबाद अस्पताल में भर्ती करवाया गया। लेकिन वह वहां से निकल कर आ गए। कहीं किराया मांग कर वाहन में तो कहीं पैदल चल कर 16 दिन से घर पहुंचे। इसके बाद 1992 में 2 दिसंबर की रात्रि को अयोध्या पहुंचे। चार दिन तक कार सेवा की। ढांचे को ध्वस्त करते समय ढांचे के मलबे में दब जाने के कारण गंभीर रूप से घायल हो गए। साथी उसे चिकित्सालय लेकर गए। इलाज के बाद वहां से कहीं पैदल तो कहीं वाहनों में सवार होकर घर तक पहुंचे।
वृद्धावस्था पेंशन ही सहारा

गोविंद राम के एक पुत्री है। वह पहले सिलाई का काम करता थे लेकिन आंख की रोशनी चले जाने के बाद, वह यह कार्य ठीक से नहीं कर पाए। बाद में उन्होंने गार्ड की नौकरी की। अब वह वृद्धावस्था पेंशन के सहारे ही जीवन गुजार रहे हैं। कुमावत ने कहा कि मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा के बाद एक बार रामलला के दर्शन कर लूं, बस अब यही एक सपना है।
बिछड़ने पर साथी कार सेवकों ने बोली सवामणी

कुमावत ने बताया कि 1990 में कार सेवा में साथ गए साथियों से बिछड़ गया था। इस पर गांव के ही मालीराम शर्मा च अन्य साथियों ने जीण माता की सवामणी बोली। मेरे 16 दिन बाद घर पहुंचने पर उन्होंने जीणमाता धाम जाकर सवामणी की।


जिले के नेत्रहीन व्यक्ति अब महाभारत व रामायण पढ सकेंगे। जिला मुख्यालय पर गांधी चौक के निकट स्थित राजकीय जिला पुस्तकालय में ब्रेल लिपि में लगभग चार सौ पुस्तकें आ गई है। इनमे रामायण, महाभारत, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, कहानियां सहित अनेक प्रकार की पुस्तकें हैं। इस पुस्तकालय में पहले सामान्य व्यक्तियों के लिए ही पुस्तकें थी।अब राजा राम मोहन राय पुस्कालय संगठन कोलकाता के सहयोग से ब्रेल लिपि में नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए भी पुस्तकें आई है। यहां कोई भी ब्रेल लिपि का जानकार व्यक्ति आकर इन पुस्तकों को पढ़ सकता है।जिला पुस्तकायल की विशेष पुस्तकें ब्रेल लिपि में है।


कार्यवाहक पुस्तकालयाध्यक्ष द्वारिका प्रसाद सैनी ने बताया कि नेत्रहीनों के पढ़ने और लिखने का एक ऐसा कोड है जो स्पर्श के माध्यम से समझा जा सकता है । इस लिपि में एक विशेष प्रकार के कागज का इस्तेमाल होता है, जिस पर उभरे हुए अक्षरों को छू -कर पढ़ा जा सकता है। किसी टाइपराइटर की तरह ही ब्रेल लिपि को भी 'ब्रेलराइटर' मशीन के माध्यम से लिखा जा सकता है। इसमें 6 बिंदुओं के उपयोग से कुल 64 अक्षर और चिह्न होते हैं ।


जानें क्यों मनाते हैं ब्रेल लिपि दिवस

ब्रेल दिवस फ्रांस निवासी लुई ब्रेल नाम के व्यक्ति के जन्मदिन के अवसर पर चार जनवरी को मनाया जाता है। वे 'ब्रेल लिपि' के आविष्कारक थे । बचपन में हुई दुर्घटना में एक बार उनकी आंख क्षतिग्रस्त हो गई थी और 8 वर्ष की उम्र से उन्हें दिखाई देना बंद हो गया था । आर्थिक तंगी के कारण उनका समुचित इलाज नहीं हो सका। उनके सम्मान में ही संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 6 नवंबर 2018 को ये प्रस्ताव पारित किया कि लुई ब्रेल के जन्मदिन के अवसर पर प्रति वर्ष 4 जनवरी को 'विश्व ब्रेल दिवस' मनाया जाए। लुई ने जब यह लिपि बनाई तब वे केवल 15 वर्ष के थे।


बोलती भी है मशीन

इसके अलावा पुस्तकालय में एक मशीन ऐसे भी भी है, जिसके नीचे पुस्तक रखने पर वह उसका अनुवाद बोलकर सुनाती है। इसके लिए विशेष स्कैनर मशीन को कम्प्यूटर व स्पीकर से जोड़ रखा है।

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