>>: कालाष्टमी आज, मनेगा भैंरूबाबा का जन्मदिन

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सीकर/रींगस. कस्बे के लोक देवता भैंरूबाबा का धाम करीब 600 वर्ष पुराना है। कालाष्टमी के दिन आकाशवाणी होने के साथ ही रींगस में भैरुबाबा की प्रतिमा की स्थापना हुई थी। भैंरू बाबा मंदिर कमेटी के पदाधिकारियों ने बताया कि मंदिर के बारे में उनके पूर्वजों ने बताया कि ब्रह्माजी के पांचवें मुख से शिवजी की आलोचना के बाद भगवान शिव के पांचवे रुद्र अवतार के रूप में भैंरूबाबा के रूप में अवतरित हुए एवं अपने नाखून से ब्रह्माजी का पांचवा मुख धड़ से अलग कर दिया था। इसके बाद भैंरूबाबा को ब्रह्महत्या का अभिशाप लग गया। अभिशाप से मुक्ति पाने के लिए शिवजी के आदेश पर भैंरूबाबा ने तीनों लोकों की यात्रा की थी।

भैंरूजी मंदिर पुजारी परिवार ने बताया कि भैंरू बाबा मंदिर के पुजारी गुर्जर जाति से होने के कारण गाय चराते थे व मंडोर जोधपुर में निवास करते थे। गायें चराते समय एक छोटे पत्थर की गोल मूर्ति भैंरूबाबा के रूप में झोली में रख कर पूजा करते थे। गायें चराते समय अधिकतर गुर्जर तालाबों के किनारे ही रुकते थे। वे जहां भी रुकते वहीं झोली से भैंरू बाबा की मूर्ति निकाल कर शाम को पूजा के साथ भोग लगा कर सो जाते थे।

सुबह उठकर नित्य कर्म के साथ पूजा कर छोटे पत्थर की भैंरू बाबा की मूर्ति को वापस झोले में रखकर गायों के साथ निकल जाते थे। इसी क्रम में मंडोर जोधपुर से चलते हुए दूदू के पास स्थित पालू गांव, जयपुर के पास स्थित बेनाड़ होते हुए रींगस में आकर तालाब किनारे रात्रि विश्राम किया। झोली से पत्थर की मूर्ति निकाल कर पूजा के बाद खाना खाकर सो गए। सुबह रवाना होने के लिए मूर्ति को वापस झोले में डालने के लिए उठाने लगे तो वह उठी नहीं। उठना तो दूर की बात छोटे से पत्थर की मूर्ति हिल भी नहीं पा रही थी। मूर्ति को उठाने के लिए गुर्जर समाज के लोगों ने काफी प्रयास किए और नहीं उठने पर निराश होकर बैठ गए। इसके बाद अचानक आकाशवाणी हुई। स्वयं भैरू बाबा ने बताया कि उन्होंने ब्रह्मा हत्या का प्रायश्चित करने के लिए पृथ्वी लोक की पदयात्रा इसी स्थान से शुरू की थी आज वही स्थान आ गया है और वे इसी स्थान पर निवास करना चाहते हैं। इसके बाद पुजारी परिवार के लोग यहीं रुक गए। भैंरू बाबा की मूर्ति की स्थापना कर पूजा अर्चना करने लगे। दिन में तालाब के आसपास गायों को चराकर जीवन यापन करने लगे।

मूर्ति ने श्मशान की भस्म से विशाल रूप किया धारण

प्रतिहार गोत्र के गुर्जर समाज की ओर से भैंरूबाबा की पूजा की जाती है। उनके अनुसार मार्गशीर्ष की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन ही भैंरू बाबा शिवजी के पांचवे रूद्र अवतार के रूप में अवतरित हुए थे। पूर्व में भैंरूबाबा की प्रतिमा के चारों ओर श्मशान होने के कारण हवा के झोंकों के साथ उठने वाली भस्मी को भैंरूबाबा की प्रतिमा धारण करती थी। श्मशान की भस्मी को धारण करके भैंरूबाबा की मूर्ति विशाल होती गई, लेकिन वर्तमान में मंदिर का जीर्णोद्धार होने के बाद मंदिर चारों तरफ से बंद होने के कारण मूर्ति यथास्थिति रूप में है।

भैंरूबाबा के धाम पर आने वाले श्रद्धालु पवित्र जोहड़ी में स्नान करके बाबा की पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस जोहड़ी में स्नान करने के बाद पूजा करने से लोगों की मनोकामनाएं पूरी होती है। दिल्ली, यूपी, एमपी, हरियाण, पंजाब सहित देश के कोने कोने से लोग भैंरूबाबा की पूजा अर्चना के लिए रींगस आते है। भाद्रपद महिने में लोग अपने छोटे बच्चों के जात जडूले भी भैरूजी मंदिर में उतारने के लिए आते है, लेकिन वर्तमान में प्रशासन की अनदेखी के चलते भैरू बाबा की पवित्र जोहड़ी का अस्तित्व खतरे में है। जोहड़ी में पानी की मात्रा काफी कम होने से श्रद्धालुओं व जोहड़ी में रहने वाली मछलियों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

भैरवाष्टमी पर होंगे धार्मिक कार्यक्रम

भैंरू बाबा धाम पर भैरव अष्टमी पर अनेक धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। मंदिर पुजारी हरीश गुर्जर ने बताया कि मंदिर की विशेष सजावट के साथ ही बाबा की प्रतिमा का भव्य श्रंगार करके सजाया जाएगा। मंदिर में केक काटकर बाबा का जन्मदिन मनाया जाएगा। 3100 दीप प्रज्वलित करके मंदिर में रंगोली सजाई जाएगी।

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