>>: अतीत की बात: साइकिल चलाने और रेडियो सुनने के लिए भी जरूरी था लाइसेंस

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कल्याण सिंह राजपुरोहित
बिलाड़ा (जोधपुर) . नई पीढ़ी के लिए यह बात किसी अजूबे से कम नहीं है कि एक जमाने में रेडियो सुनने के लिए तथा साइकिल चलाने के लिए भी सरकारी विभाग से लाइसेंस लेना पड़ता था।


वर्ष 1960 के दशक के दौरान रेडियो सुनने ओर साइकिल चलाने के लिए भी लाइसेंस की जरूरत पड़ती थी और इसे बाकायदा भारतीय डाक तार विभाग एवं पंचायत की ओर से जारी किया जाता था।यह लाइसेंस उसी प्रकार का होता था, जिस प्रकार से आज वाहन चलाने, हथियार रखने या अन्य किसी काम के लिए लाइसेंस बनाना पड़ता है।

रेडियो सुनने के लिए यह लाइसेंस भारतीय डाक विभाग, भारतीय तार अधिनियम 1885 के अंतर्गत जारी करता था। यह डोमेस्टिक व कॉमर्शियल दो प्रकार का होता था। यानी घर पर बैठकर रेडियो सुनना है तो डोमेस्टिक और सामूहिक रूप से कई लोगों को रेडियो सुनाना है तो वह कॉमर्शियल।

लाइसेंस पर निर्धारित शुल्क

जारी किए जाने वाले लाइसेंस पर आकाशवाणी लाइसेंस टिकट लगाकर इसे प्रतिवर्ष रिन्यूवल कराया जाता था और बिना लाइसेंस के रेडियो कार्यक्रमों को सुनना कानूनी अपराध माना जाता था। इसमें आरोपी को वायरलेस टेलीग्राफी एक्ट 1933 के अंतर्गत दंडित किए जाने का भी प्रावधान था। लाइसेंस में रेडियो का मैक और मॉडल का भी उल्लेख किया जाता था।

लालटेन जैसी छोटी बत्ती

ग्रांटेड अंडर सेक्शन 70 ऑफ द केरला पंचायत एक्ट 32 आप 1960 और रूल 9 ऑफ द केरला पंचायत व्हीकल टैक्स रूल्स 1963 के तहत केरल राज्य में साइकिल चलाने के लिए भी स्थानीय पंचायत में शुल्क चुका कर लायसेंस लेना होता था। रात्रि में साइकिल के आगे लालटेन जैसी छोटी बत्ती भी लगाया जाना आवश्यक था, कई वर्षों तक अकेला आदमी या औरत ही चला सकने के लिए प्रावधान था।

रेडियो सुनने का क्रेज

शिक्षाविद सत्यनारायण गौड़ अपने गुजरे जमाने को याद करते हुए बताते हैं कि उन दिनों लोगों में रेडियो सुनने का बड़ा क्रेज था। उनके पिता फाउलाल जी के नाम से रेडियो का लाइसेंस था। यह रेडियो मुम्बई से लाया गया था और सन 1963 में जारी किया गया। बाद में लगातार बिलाड़ा पोस्ट ऑफिस में रिन्यू करवाया गया।

लाइसेंस रजिस्ट्रेशन संख्या 5673 को एक साल बाद दो रुपए आकाशवाणी लाइसेंस शुल्क की टिकट से रिन्यू कराया गया। उस दौर में रेडियो लोगों के लिए नई चीज था। गांव कस्बे में एक आध-घर में रेडियो होता था। उस समय पूरा गांव शाम के समय इसे सुनने के लिए उस घर के बाहर जमा हो जाता था, जिनके पास रेडियो था। लोग रेडियो पर खबरें, लोकगीत और खास दिन जैसे 15 अगस्त, 26 जनवरी या किसी त्योहार पर रेडियो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम चाव से सुनते थे। उस जमाने में रेडियो पर सबसे ज्यादा खबरों के बुलेटिन सुनने का चाव था।

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