>>: सरसों बेलगाम, 8000 रुपए के ऐतिहासिक ऊंचाई पर दाम

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जयपुर। कोरोना काल में जोरदार मांग और किसानों की ओर से भावों में ओर तेजी की आशंका से रोक-रोक कर बाजार में माल लाने के कारण स्थानीय मंडियों में सरसों के दामों ने 8000 रुपए प्रति क्विंटल के ऐतिहासिक आंकड़ें को पार कर लिया है। देश में इस समय सरसों का बैलेंस 36 लाख टन है। नई फसल फरवरी आखिर या मार्च के शुरुआती सप्ताह में आएगी। तब तक अगर सरकार पाम ऑयल और सोयाबीन पर लगने वाले आयात शुल्क को नहीं घटाती है, तो त्योहारों सीजन में इसके दामों में नरमी के आसार कम ही नजर आ रहे हैं। बाजार सूत्रों का कहना है कि पहले विदेश से ब्लेंड ऑयल आता था, जो सरसों तेल में मिलाया जाता था। अब केंद्र सरकार ने ब्लेंड ऑयल पर ड्यूटी बहुत अधिक बढ़ा दी है। इस कारण पर्याप्त मात्रा में ब्लेंड ऑयल नहीं आयात हो पा रहा है। भारतीय बाजार में जो तेल है, उसका ही इस्तेमाल हो रहा है। अब ज्यादातर कच्ची घानी का तेल है, जिसमें ब्लेंड ऑयल नहीं मिला है। इसलिए भी कीमतों में इजाफा हुआ है।
अधिकांश खाद्य तेल 50 फीसदी तक महंगे
आंकड़ों के मुताबिक सभी तरह के खाद्य तेलों की खुदरा कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। जनवरी 2020 से उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक मूंगफली तेल की कीमत 15 फीसदी, सोयाबीन तेल की कीमत 55 फीसदी, पाम ऑयल की कीमत 62 फीसदी और सूरजमुखी के तेल की कीमत 76 फीसदी बढ़ी है। एक साल में खाद्य तेल के खुदरा भाव भी 80 से 100 रुपए प्रति लीटर उछल चुके है।
खाद्य तेलों के उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं
भारत खाद्य तेलों के उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं है और उसे अपनी घरेलू मांग का आधा से अधिक आयात करना पड़ता है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक भारत को अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए 56 फीसदी खाद्य तेल आयात करना पड़ा। देश में आयात होने वाले खाद्य तेलों में 95 फीसदी पाम, सोयाबीन और सनफ्लावर ऑयल है। सरकार ने इन पर 35 से 40 फीसदी का आयात शुल्क लगा रखा है।
मस्टर्ड ऑयल प्रॉड्यूशर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बाबूलाल डाटा सरकार को सरसों तेल के बढ़ते दामों पर लगाम लगानी चाहिए। आयातित तेल पर शुल्क घटाने की जरूरत है, नहीं तो लोगों को इस बार त्योहारी सीजन में महंग तेल का बोझ उठाना पड़ेगा। किसान भी ऊंचे भावों की आस में मंडियों में माल नहीं ला रहे है, इससे भी भाव बढ़ रहे है। नई फसल आने में भी सात माह का समय है, ऐसे भावों में नरमी सिर्फ सरकारी रूख पर ही तय करगी। ऊंचे भावों के कारण राजस्थान में सरसों तेल की करीब 1800 यूनिटें हैं। इनमें भी 50 फीसदी से भी कम इकाइयां चल पा रही हैं।

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