>>: स्वतंत्रता आंदोलन में लोहागढ़ की महिलाओं ने भी निभाई भूमिका

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भरतपुर में स्वतंत्रता आंदोलन का सूत्रपात एवं राष्ट्रीय चेतना पं. मदनमोहन मालवीय की प्रेरणा से 13 अगस्त 1912 ई. को भरतपुर में हिंदी साहित्य समिति की स्थापना से हुई। इस संस्था ने भरतपुर में राजनैतिक जागृति का संचार किया। भारतवीर साप्तााहिक पत्र ने स्वदेश भावना एवं राष्ट्रीय जन जागरण में महती भूमिका अदा की।
सन् 1928 में देश में साइमन कमीशन का जोरदार बहिष्कार और महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह संबंधी दांडी कूच की घटनाओं ने भरतपुर में स्वतंत्रता लहर उत्पन्न कर दी थी। 28 मार्च 1930 को मेजर रोबसन ने प्रेसीडेंट स्टेट कौंसिल का पद संभाला। रोबसन ने भी मैकेंजी की तरह स्वेच्छाचारिता शासक की तरह दमन और उत्पीडऩ की नीति अपनाई। अनेक राष्ट्रवादी देशभक्तों को भरतपुर से आगरा, मथुरा एवं अजमेर जाकर राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया। इनमें गोकुल वर्मा, ठाकुर देशराज, मा. आदित्येंद्र, गोकुलचंद दीक्षित, कुं. रतन सिंह, पं. रेवतीशरण, ठाकुर माधोसिंह, सांवलप्रसाद चतुर्वेदी, पं. हरिशचंद आदि ने संघर्ष पथ का अनुगमन करके अंग्रेज साम्राज्यशाही का विरोध किया, बड़े-बड़े आंदोलन किए।
जितनी भी राष्ट्रीय गतिविधियां भरतपुर में हुई, उनकी प्रेरक शक्ति कमोवेश कांग्रेस ही थी। सन् 1937 में जब कांग्रेस के राष्ट्रपति पं. जवाहरलाल नेहरू जोधपुर से इलाहाबाद लौट रहे थे। उस समय भरतपुर स्टेशन पर गोकुल वर्मा, जगन्नाथ कक्कड़, गौरीशंकर मितल, मा. फकीरचंद, रामभरोसेलाल वर्मा आदि ने स्टेशन पर उनका स्वागत किया और राज्य में कांग्रेस मंडल स्थापित करने का आग्रह किया। दो अक्टूबर 1937 को भरतपुर कांग्रेस मंडल की स्थापना हुई।
अंग्रेजी साम्राज्यशाही की ह्रदयहीनता, उनके अमानुषिक अत्याचारों के मुकाबले के लिए लोहागढ़ के बलिदानी नर-नारियों ने अपने पूर्व अल्टीमेटक के अनुसार संघर्ष का बिगुल बजा दिया। अपने जनप्रिय नेताओं की गिरफ्तारियों और जेलों में डालने से सत्याग्रह ने और भी तीव्रता दिखाई। 21 जून 1939 को भरतपुर की वीरांगनाओं ने गिरफ्तारी देकर सत्याग्रह को एक नई दिशा दी। छठी डिक्टेटर ठकुरानी त्रिवेणी देवी जघीना के नेतृत्व में शीला देवी, कृष्णा देवी, अभौर्रा की भगवती, कृष्णा प्यारी आदि महिलाओं ने गिरफ्तारी दी। जिन्हें तीन-तीन माह की सजा हुई। गिरफ्तार महिला सत्याग्रहियों के पुत्र-पुत्रियों को बलात छीनकर अनाथालय में रखा गया। सरकार ने माताओं की ममता को कुचल कर उन्हें सत्याग्रह से विमुख करने का एक क्रूर हथकंडा अपनाया। इसकी जनता में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। भरतपुर में विद्रोह की भावना फैल गई। सत्याग्रही महिलाओं की गोद से बच्चों को छीनते समय जो चीख पुकार, बेदर्दी की खींचतान हुई व महिलाओं से घृणित व्यवहार किया गया। उससे सारा वातावरण ही रोषमय और आंदोलित हो उठा। जेल में बंद सत्याग्रही नेताओं को इस दुखद समाचार की जब जानकारी हुई तो उन्होंने जेल में भूख हड़ताल कर दी। जन आक्रोश के सामने सरकार की पराजय हुई। फलत: बच्चे माताओं को वापस करने पउ़े। राजस्थान की अन्य किसी रियासत में इतना लंबा व व्यापक जन आंदोलन नहीं चलाया गया। इसमें इतनी बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुई हों और इतनी लंबी अवधि तक सत्याग्रही जेल में बंद रहे हों।

रामवीर सिंह वर्मा
वरिष्ठ साहित्यकार

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