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Table of Contents

मेड़ता शहर में सांडों के आतंक का एक और दिल दहला देने वाला वीडियो सामने आया। जिसमें एक युवक पर 5 सांडों ने हमला कर दिया। कुछ ही देर में कई सांड एकत्रित हो गए और 1.30 मिनट तक युवक को रौंदते रहे। युवक के दोस्त और मौके पर मौजूद लोग उसे बचाते रहे, लेकिन सांड वापस उसी युवक पर अटैक करते रहे। गनीमत रही कि 5 सांडों के हमले के बाद भी युवक बच गया।


जानकारी के अनुसार शहर के हड्डीपुरा स्थित गौरियों के मोहल्ले में रहने वाला युवक जफर पठान (17) पुत्र मोहम्मद रईस सांडों के हमले का शिकार हुआ। वह 15 दिसंबर की रात के वक्त अपने एक दोस्त के साथ होटल पर खाना खाने जा रहा था। इस दौरान रेण रोड स्थित एक गेस्ट हाउस के पास एक सांड दौड़ता हुआ आया हमला कर दिया। कुछ सेकंड बाद सड़क के दूसरी तरफ बैठे सांड भी आए और जफर पर हमला बोल दिया। यह सिलसिला करीब 1 मिनट 30 सेकंड तक चला। उसे आस-पास मौजूद लोगों ने बचाया।

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पीड़ित की जुबानी...

"मैं बार-बार सांड के चंगुल से छुड़ने की कोशिश करता रहा, लेकिन वे वापस मुझे पैरों और सिंगों से रोंदते रहे। दोस्तों और वहां मौजूद लोगों ने एकबारगी बचा भी लिया, लेकिन वापस सांड आए और मुझे पैरों से कुचलते हुए सड़क के दूसरी तरफ ले गए। बाद में बड़ी मुश्किल से मैं बच पाया हूं। पूरे शरीर पर खरोंचों और चोटों के निशान हो गए। '
- जैसा घायल युवक जफर पठान ने बताया

अक्सर ठंड बढऩे के साथ ही हार्ट अटैक के मामले बढऩे लगते हैं, लेकिन इस बार शहर में पिछले 15-20 दिन में हार्ट अटैक से हुई युवाओं की मौतों ने हर किसी को डरा दिया है। शाम को हंसते-खेलते सोए और सुबह पता चला कि हार्ट अटैक से मौत हो गई। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें संभलने का मौका ही नहीं मिला। कुछ तो अस्पताल पहुंचने के बाद भी नहीं बच पाए।

दरअसल, ठंड के मौसम में शरीर को गर्म रखने के लिए हृदय को अधिक मेहनत करनी पड़ती है और ब्लड को पंप करते समय रक्त कोशिकाएं सिकुड़ जाती हैं। इससे हृदय के कामकाज में परेशानी होती है और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है। शहर के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. बीएल बिशु ने बताया कि हार्ट अटैक से होने वाली 80 प्रतिशत मौतें सर्दी के चार महीने में होती है, जबकि 20 प्रतिशत मौतें शेष 8 महीने में होती है, इसलिए हृदय रोगियों के साथ अन्य लोगों को भी सर्दी में विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है। सर्दी में खून गाढ़ा हो जाता है।


शहर के लोढ़ा की पोल में एक शादी समारोह में भाग लेने गुजरात वापी से आए अंकुश लुणावत की मौत से हर कोई स्तब्ध है। दरअसल, नागौर निवासी 27 वर्षीय अंकुश वापी में व्यापार करता है। साली की शादी होने पर वह यहां आया था और 12 दिसम्बर को शादी समारोह के कार्यक्रम में डांस कर रहा था। इस दौरान छाती में दर्द होने पर उसने ईसीजी करवाई और डॉक्टर को दिखाया। ईसीजी देखते हुए डॉक्टर ने उसे भर्ती होने के लिए कहा, लेकिन उसने हल्के में लिया और वहां से रवाना हो गया। इसके बाद किसी परिचित ने कहा तो पास के ही दूसरे अस्पताल में रुका, लेकिन पांच मिनट बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। रिश्तेदारों ने बताया कि 15-20 दिन बाद उसकी भी शादी होने वाली थी। इससे पहले प्रताप सागर कॉलोनी में रहने वाली सुनील बोहरा की मौत ने भी हर किसी को झकझोर कर रख दिया।


सर्दियों में हार्ट अटैक आने के कारण

ऐसे में लोगों के जहन में यह सवाल आता है कि सर्दी के मौसम में ही हार्ट अटैक का खतरा क्यों बढ़ता है। डॉक्टरों का कहना है कि ठंड के मौसम में नसें सिकुडकऱ सख्त हो जाती हैं। इन्हें नॉर्मल करने के लिए शरीर में ब्लड फ्लो बढ़ता है और इससे ब्लड प्रेशर भी बढ़ जाता है। दिल पर दबाव पड़ता है जो हार्ट अटैक का कारण बनता है। डायबिटीज के मरीज को छह से आठ घंटे में खाना खा लेना चाहिए, कुछ लोग 12 से 13 घंटे बाद खाते हैं, जिसके कारण उनमें हार्ट अटैक की संभावना बढ़ जाती है।

हार्ट अटैक के लक्षण
हार्ट अटैक का सबसे प्राथमिक लक्षण है सीने में दर्द होना। इसके साथ बाएं हाथ में दर्द, पसीना आना और सांस की तकलीफ। कुछ लोगों को गैस होने की फीलिंग आती है। महिलाओं में पेट दर्द व कलेजे में दर्द हो तो भी हार्ट अटैक की आशंका रहती है।

डॉक्टर से जानिए, हार्ट अटैक से कैसे बचा जा सकता है
सर्दियों में हार्ट अटैक से बचने के लिए क्या करना चाहिए, इसको लेकर हमने जेएलएन अस्पताल के फिजिशियन डॉ. अशोक झाड़वाल से बात की, उन्होंने बताया कि सर्दियों के दिनों में हार्ट की बीमारी से परेशान लोगों को सुबह बहुत जल्दी नहीं उठना चाहिए। जल्दी बिस्तर छोडऩे से सुबह के वक्त ठंड में नसें सिकुड़ी रहती हैं और ऐसे में तुरंत व्यायाम करने से परेशानी हो सकती है।
- सर्दियों में हल्की धूप निकलने पर बाहर निकलें और हल्की वॉक या व्यायाम करें। शरीर को गर्म कपड़ों से कवर करके रखें और हार्ड वर्कआउट से बचें।
- ठंड में लोग अक्सर तला भुना खाना (ऑयली फूड) ज्यादा खाने लगते हैं, जिससे बैड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ जाती है। ऐसे में हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है।
- हार्ट को हेल्दी रखने के लिए ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखना जरूरी है। सर्दियों में कम से कम नमक का सेवन करें। शरीर में नमक पानी को रोकता है और हार्ट को इस लिक्विड को पम्प करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है।
- सर्दियों में ज्यादा पानी पीने से हार्ट को ज्यादा लिक्विड पंप करना पड़ता है। ऐसे में दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे हार्ट अटैक का रिस्क बढ़ता है।

युवाओं में अचानक हार्ट अटैक बढऩे का कारण
युवाओं में अचानक हार्ट अटैब बढऩे को लेकर विशेषज्ञों से बात करने पर डॉ. प्रहलाद ढाका व डॉ. झाड़वाल ने बताया कि खानपान व अनियमित दिनचर्या युवाओं में हार्ट अटैक का कारण बन रही है। आजकल युवा स्मॉकिंग और अल्कोहल का ज्यादा सेवन करने लगे हैं। तम्बाकू का सेवन चाहे चबाकर करें या स्मॉकिंग से, दोनों ही नुकसानदायक है। आजकल के युवा मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने लगे हैं, जिसके कारण उनका फिजिकल वर्कआउट कम हो गया है। इसके बाद वे ऑयली फूड और होटल का खाना ज्यादा खाते हैं, जिसके कारण हार्ट अटैक की समस्या ज्यादा होने लगी हैं।

चुनाव में शराब की बात ना हो, ऐसा कैसे हो सकता है। लोग कहते भी हैं कि वोटों के लिए या तो शराब या फिर इसके लिए पैसे बांटे गए। चुनाव जीतने के लिए दारू/शराब बांटने का भरम इस बार कुछ टूट सा गया है। वो इसलिए भी कि चुनाव के तकरीबन डेढ़ महीने में शराब व बीयर की खपत ही घटकर रह गई। पिछले साल के मुकाबले इस बार चुनावी डेढ़ महीने में शराब व बीयर की खपत में करीब एक करोड़ 22 लाख रुपए की कमी आई है।

सूत्रों के अनुसार चुनाव आचार संहिता लागू होने से चुनावी परिणाम आने (15 अक्टूबर से तीन दिसम्बर) यानी 48 दिन में शराब की बिक्री व उपयोग को लेकर जिलेभर का आकलन किया गया तो यह सच सामने आया। पिछले साल में इन्ही दिनों में पी गई शराब व बीयर इससे बहुत ज्यादा थी। आबकारी विभाग से मिले आंकड़ों पर नजर डालें तो इस बार इन 48 दिन में देसी मदिरा/ राजस्थान मेड लिकर (आरएमएल) की बिक्री जरूर पिछले साल के मुकाबले बढ़ी। पिछले साल इन दिनों में जहां 20 लाख 42 हजार 84 लीटर देसी/आरएमएल की बोतल बिकी तो इस बार इनकी संख्या 21 लाख 21 हजार 782 बोतल थी। पिछले साल 15 अक्टूबर से तीन दिसम्बर तक इनसे 16 करोड़ 68 लाख 59 हजार 164 रुपए आए तो इस बार यह राशि 17 करोड़ 5 लाख 70 हजार 969 रुपए रही। यानी केवल देसी/आरएमएल की बिक्री ही बढ़ी है।

सबको पता ही है कि शराब महंगी होने के साथ सेहत के लिए हानिकारक भी है। इस सामाजिक बुराई को बंद करने की समय-समय पर मांग भी उठती रहती है। बावजूद इसके नागौर जिले में औसतन 35 हजार से अधिक बीयर रोजाना पी जा रही है। सेहत के लिए नुकसानदायक मानी जाने वाली शराब सरकार के लिए फायदे का सौदा बनती जा रही है। इसकी खपत भी बढ़ रही है और सरकार की आमदनी भी। चुनाव में अवैध शराब के कारोबार से मना नहीं किया जा सकता। एक ट्रक तो सदर थाना पुलिस ने पकड़ा था, जिसमें 75 लाख से अधिक की शराब थी।

अंग्रेजी शराब और बीयर में पीछे

आंकड़ों के हिसाब से इस साल चुनावी सीजन के 48 दिन में 5 लाख 48 हजार 525 बोतल अंग्रेजी शराब तो 14 लाख 85 हजार 593 बोतल बीयर बिकी। इसके बदले 23 करोड़ 15 लाख 88 हजार रुपए की आय हुई पर पिछले साल इन्हीं दिनों में अंग्रेजी शराब की 5 लाख 91 हजार 390 बोतल तो बीयर की 15 लाख 61 हजार 715 बोतल बिकीं। इसके बदले 41 करोड़ 29 लाख 11 हजार रुपए की कमाई हुई। यानी इस बार इन दिनों में चुनाव होने के बावजूद एक करोड़ 22 लाख रुपए कम की शराब बिकी। मतलब साफ है या तो चुनाव में शराब बांटी गई तो वो यहां से नहीं खरीदी गई या फिर चुनाव आचार संहिता की सख्ती के चलते शराब का उपयोग/दुरुपयोग हो ही नहीं सका।

देसी के शौकीन ज्यादा

सूत्रों का कहना है कि अंग्रेजी शराब के मुकाबले देसी मदिरा की खपत चौगुनी है। अकेले वर्ष 2020-21 में ही 82 लाख 92 हजार 900 लीटर देसी शराब बिकी तो वर्ष 2021-22 में तो देसी मदिरा इससे दस लाख अधिक लीटर बिकी। अंग्रेजी शराब की वर्ष 2020-21 में करीब अठारह लाख लीटर तो वर्ष 21-22 में करीब 23 लाख 64 हजार लीटर से अधिक की बिकवाली हुई। वर्ष 22-23 में यह आंकड़ा तीस लाख लीटर से अधिक था जो इस साल और बढ़ गया है।

शुरुआती चार महीने में ही दो सौ करोड़

आधिकारिक रूप से तो डीडवाना-कुचामन जिला अभी अलग हुआ ही है। इसको मानते हुए नागौर जिले में अप्रेल से जुलाई तक दो सौ करोड़ रुपए तो यहां के शौकीनों ने शराब पर खर्च कर दिए, जिसमें करीब सौ करोड़ सरकार की जेब में गए। पिछले साल के मुकाबले इस शुरुआती चार महीने में साढ़े तीन लाख बीयर ज्यादा बिकी। अब तक करीब आठ महीने में आबकारी विभाग को छह सौ करोड़ से अधिक की आय हो चुकी है। हमेशा की तरह इस बार भी कहा गया था कि शराब चुनाव में खूब बंटी पर बंटी तो खरीदी कहां से?

इनका कहना

पिछले साल के मुकाबले करीब डेढ़ महीने में शराब की खरीद चुनाव के दौरान कम रही। करीब एक करोड ़22 लाख की शराब/बीयर कम थी, देसी की खपत इस बार ज्यादा थी।

-मनोज बिस्सा, जिला आबकारी अधिकारी, नागौर।

नागौर. सरकारी विद्यालयों में नामांकन बढ़े तो आखिर कैसे? हालत यह है कि नागौर (कुचामन-डीडवाना) जिलेभर के तीन दर्जन से अधिक विद्यालयों में तो विज्ञान/वाणिज्य/कला संकाय के व्याख्याता ही नहीं हैं। एक-दो विषय व्याख्याता की कमी हो तो चल भी जाए, ऐसे-ऐसे भी विद्यालय हैं जहां विज्ञान संकाय तो हैं पर इससे जुड़ा एक भी व्याख्याता यहां नियुक्त नहीं है। ऐसे में कोई पेरेंट्स अपने बच्चों को क्यों सरकारी विद्यालय में दाखिल कराएगा। कई विद्यालय ऐसे हैं जहां संकाय तो तीन पर व्याख्याता इक्का-दुक्का है।सूत्रों के अनुसार सरकारी विद्यालयों के नामांकन बढ़ाने की सरकारी कवायद धरी रह गई। पत्रिका की पड़ताल में जो कुछ सामने आया वो कम गंभीर नहीं है। नागौर शहर के पास स्थित एक गांव के बारहवीं तक के विद्यालय में विज्ञान संकाय तो है, लेकिन पढ़ाने को एक भी व्याख्याता नहीं हैं। ऐसे में इस संकाय का कोई भी विद्यार्थी यहां प्रवेश क्यों लेगा? नतीजन इस स्कूल में ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षा में नामांकन इस संकाय में बढ़ता कैसे? ये ही नहीं अकेले नागौर शहर में करीब आधा दर्जन विद्यालय ऐसे हैं जहां व्याख्याता नहीं व कम होने के कारण विद्यार्थी नहीं आ रहे।

सूत्र बताते हैं कि शहर के बड़े कहलाने वाले नामी सरकारी विद्यालय की बात हो या फिर डीडवाना-कुचामन समेत अन्य शहर व कस्बों के स्कूलों की, व्याख्याताओं का टोटा बराबर बना हुआ है। नामांकन की कमी की समीक्षा करने पर यही बात सामने आई कि शिक्षकों की कमी के कारण बच्चे को पेरेंट्स स्कूल में दाखिला कैसे कराएं। यह तो कुछ नहीं मुख्य विषय अंग्रेजी/गणित विषय की पढ़ाई के लिए भी कई स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं।

गुहार बार-बार पर नतीजा शून्य

सूत्रों का कहना है कि जिलेभर में करीब तीन हजार से अधिक सरकारी विद्यालय हैं, तीन दर्जन से अधिक विद्यालयों में तो व्याख्याता ही नहीं हैं। कहीं रसायन/जीव विज्ञान का व्याख्याता नहीं है तो कहीं गृह विज्ञान-भूगोल का, वाणिज्य संकाय का भी हाल लगभग ऐसा ही है। पूरे जिले में तकरीबन 42 विद्यालय ऐसे हैं जहां बड़ी संख्या में व्याख्याताओं की कमी है, इक्का-दुक्का हैं भी तो उससे कोई काम नहीं चल पा रहा। कई विद्यालयों में तो किसी संकाय का एक भी व्याख्याता नहीं है। ऐसे में ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षा में नामांकन कैसे बढ़े।

फ्लॉप-शो रहा प्रवेशोत्सव

सरकारी विद्यालयों में करीब तीन महीने चला प्रवेशोत्सव फ्लॉप शो रहा। नागौर (डीडवाना-कुचामन) के सरकारी विद्यालयों के बच्चों की संख्या करीब पांच फीसदी कम हो गई है। यह तो तब जबकि इस बार ना तो सीबीइओ को कोई लक्ष्य मिला नहीं ही प्रधानाचार्य को। बार-बार नामांकन बढ़ाने को लेकर जरूर पत्र जारी होते रहे। पिछले साल की तुलना में करीब 22 हजार बच्चे कम हो गए हैं। ना कोई लक्ष्य ना कोई दबाव, उसके बाद भी सरकारी मशीनरी पूरी तरह स्कूलों का नामांकन बढ़ाने में जुटी रही, लेकिन लोगों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। इस नए सत्र में औसतन हर कक्षा में पिछले साल की तुलना में बच्चे कम हो गए।

पिछले साल के मुकाबले 23 हजार कम

सूत्रों के अनुसार पिछले साल यानी वर्ष 2022-23 में 3 हजार 27 विद्यालयों का कुल नामांकन तीन लाख 68 हजार 674 था जो इस बार वर्ष 2023-24 में करीब तीन लाख 45 हजार रह गया। यानी करीब पांच प्रतिशत कम। ग्यारहवीं-बारहवीं की कक्षा के छात्र-छात्रा तक पिछले साल के मुकाबले करीब तीन हजार बच्चे कम हैं।कयास लगाए जा रहे हैं कि नामांकन पिछले साल के अनुरूप तो नहीं हुआ, लेकिन ऐसा भी क्या कि नामांकन इतना कम हो गया? कहा तो यह भी जा रहा है कि इस बार अन्य कक्षाओं में से भी टीसी कटाने वाले विद्यार्थियों की संख्या ज्यादा रही।उलझन में फंसा रहा प्रवेशोत्सव

इस बार प्रवेशोत्सव ही उलझनभरा रहा। शिक्षकों ने पहले हाउस होल्ड सर्वे किया, परिणाम उत्साहजनक नहीं रहे। इस बार सीबीइओ अथवा किसी भी जिम्मेदारों को कोई टारगेट नहीं दिया। सीधा-सीधा हाउसहोल्ड सर्वे में चिह्नित बच्चों का नामांकन पहली प्राथमिकता रखी गई । सर्वे भी पहले एप के जरिए होना था, इसके लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित भी किया गया , हालांकि हाउस होल्ड सर्वे ऑफ लाइन ही प्रारंभ हुआ। फिर नए आदेश के तहत शिक्षा से वंचित बच्चों को ऐप के माध्यम से दर्ज करने को कहा है।

इनका कहना

कुछ विद्यालयों में व्याख्याताओं की कमी है। नागौर शहर के ही करीब आधा दर्जन स्कूल इससे प्रभावित हैं। बार-बार मुख्यालय को इस बाबत बताया जाता है। संभवतया जल्द ही ये पद भर जाएंगे।-रामनिवास जांगिड़, कार्यवाहक सीडीइओ, नागौर।

-तालाब आवक के रास्तों पर हुए निर्माणों ने रोका बारिश का पानी, अब बरसात का पानी तालाब तक नहीं पहुंच पाता, फिर भी प्रशासनिक अधिकारियों को पता नहीं कि तालाब का कैचमेंट एरिया हो गायब हो गया
अभियान...
नागौर. शहर के अन्य तालाबों की तर्ज पर प्रतापसागर तालाब का कैचमेंट एरिया भी पक्के निर्माणों की बलि चढ़ गया है। इसके कैचमेंट एरिया में हुए सैंकड़ों की संख्या में पक्के निर्माणों की वजह से कैचमेंट एरिया अब नजर भी नहीं आता है। बताते हैं कि यह पक्के निर्माण इस तालाब के चारों ओर के कैचमेंट एरिया में किए गए हैं। इतने निर्माणों के बाद भी यह सिलसिला नहीं रुका है, बल्कि कोई कार्रवाई नहीं होने के कारण इसकी संख्या में और ज्यादा बढ़ोत्तरी होती जा रही है।
बरसाती पानी की आवक पर लगी लगाम
शहर के प्रमुख तालाबों में शामिल प्रतापसागर तालाब का का जलबंध एरिया खत्म हो गया, और प्रशासन को पता भी नहीं चला। इसके चलते न केवल तालाब की प्रकृति ही नहीं बदली गई, बल्कि पूरा जलबंध एरिया ही खत्म कर दिया गया। इसकी वजह से बारिश के दौरान होने वाली बरसाती पानी के आवक पर अब लगाम लग चुकी है। हालांकि बारिश तो अब भी होती है, लेकिन इसका कैचमेंट एरिया नहीं होने के कारण यह पूरा तालाब लगभग खाली ही रहता है। जानकारों की माने तो पिछले दस से पंद्रह वर्षों के दौरान कैचमेंट एरिया में हुए निर्माणों की आई बाढ़ ने तालाब में बरसाती पानी की आवक पर पूरी तरह से रोक ही लगा दी। स्थिति यह है कि इसके आसपास हुए निर्माणों की वजह से न केवल जलबंध एरिया खत्म हो गया, बल्कि यह इसका आकार भी एक छोटे पोखर की तरह हो चुका
इस तरह से इसमें बरसात के पानी की हो रही थी आवक
प्रतापसागर तालाब में बरसाती पानी की आवक इसके आसपास के कैचमेंट एरिया से होती थी। बताते हैं कि पहले इसमें आवक के रास्तों की संख्या दर्जनों में थी। अब सभी आवक लगभग बंद हो चुके हैं। इसके चलते अब तालाब अब पूरा कभी भर ही नहीं पाता है। प्रशासनिक अधिकारियों की माने तो तालाब के कैचमेंट एरिया में किसी भी तरह का पक्का निर्माण नहीं किया जा सकता है। इसके बाद भी पड़ताल के दौरान में यह सारे पक्के निर्माण सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की अवहेलना के साथ ही अधिकारियों की लापरवाही को दर्शाते नजर आए।
अब दर्जनों की संख्या में बारिश भी नहीं भर पाती है यह तालाब
पड़ताल के दौरान सामने आया कि पहले यह प्रतापसागर तालाब ज्यादा से ज्यादा दो बार की बारिश में ही लगभग पूरा भर जाता था। अब ऐसा बिलकुल नहीं रहा। बताते हैं कि पिछले कई सालों से प्रतापसागर तालाब पूरा भरा नजर नहीं आया। इस संबंध में प्रतापसागर तालाब पार्क में मिले अनुज, चंदन, हंसराज एवं मांगीलाल आदि से बातचीत हुई तो उन्होंने बताया कि वह लोग बरसों से तालाब के किनारे टहलते चले आ रहे र्हैं। यह पार्क भी उनके सामने ही बना। पहले तालाब का एरिया वर्तमान की अपेक्षा तीन गुना ज्यादा था। इसकी गहराई चार से पांच हाथियों के बराबर रहती थी। इसके अंदर कुएं भी थे। तालाब के पानी से आसपास का भूभाग भी रिचार्ज होता रहता था। काफी साल हो गए यह तालाब कभी भरा ही नहीं, हालांकि यह बीच में कई बार जो भरा तो वह गंदे पानी की आवक के कारण। अब मूल तालाब का स्वरूप लगभग खत्म हो चुका है। इस समय भी तालाब में नजर आ रहा पानी नाला का पानी है। इस स्थिति से वह बेहद अफसोज करते नजर आए।
इनका कहना है...
तालाब के कैचमेंट एरिया में निर्माणों की कोई जानकारी नहीं है, और न ही इस तरह की कोई शिकायत अभी फिलहाल आई है। फिर भी इसकी जांच करा ली जाएगी। प्रावधानों का पूरा पालन कराया जाएगा।
रामेश्वर गढ़वाल, तहसीलदार नागौर

-खाली पदों के अभाव में रोडवेज की स्थिति हो रही खराब, चालन, परिचालन सहित विभिन्न शाखाओं में काम हुआ प्रभावित
नागौर. डबल इंजन की सरकार बनने के बाद से राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम में खाली पदों का सूखा समाप्त होने की उम्मीद बढ़ी है। पिछले कई सालों से चालक, परिचालक, निरीक्षक सहित तकनीकी संवर्ग सहित अधिकारियों की कमी से प्रदेश के रोडवेज की स्थिति बिगड़ी है। स्थिति यह हो गई है कि विभाग के वर्कशॉप में बसों के रखरखाव और इनकी मरम्मत तक करने के लिए कर्मचारी नहीं है। इसकी वजह से बसों की संचालन व्यवस्था पूरी तरह से प्रभावित हुई है। विभाग में इस समय साढ़े नौ हजार से ज्यादा खाली पद चल रहे हैं। हालांकि प्रबंधनतंत्र की ओर से पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में रोडवेज में खाली पदों की भर्ती के लिए प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन सरकार ने मंजूरी नहीं दी थी। चुनाव के बाद अब नई सरकार के आने से रोडवेज के अधिकारियों एवं यूनियन प्रतिनिधियों को नई सरकार से आस बंधी है।

राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम के 52 आगारों में इस समय नौ हजार से ज्यादा पद खाली चल रहे हैं। इसमें अधिकारिक वर्ग के करीब ढाई हजार, डेढ़ हजार से ज्यादा परिचालक एवं साढ़े तीन हजार से ज्यादा तकनीकी संवर्ग के पद खाली चल रहे हैं। इन खाली पदों की वजह से रोडवेज के आगारों की स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। सर्वाधिक खाली पद तकनीकी संवर्ग के हैंं। जानकारों के अनुसार तकनीकी संवर्ग के खाली पदों पर नियुक्तियां नहीं होने के कारण प्रदेश के डिपों की कार्यशाला में बसों की सार-संभाल तक नहीं हो पा रही। इसी तरह अन्य सवंर्गों में खाली पदों की वजह से निरीक्षण, बसों के संचालन आदि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। बताते हैं कि खाली पदों पर भर्तियां हुई तो तो फिर चालन, परिचालन, लेखा, कम्प्यूटर कार्य सहित यात्रियों को टिकट दिए जाने के कार्य गति आने के साथ ही बसों के रखरखाव व मरम्मत आदि की स्थिति सुधार होने से राजस्व में भी खासी बढ़ोत्तरी होगी।
प्रदेश के रोडवेज में खाली पदों के आंकड़ों पर एक नजर
प्रदेश रोडवेज में कुल पदों की संख्या- 22348
प्रदेश रोडवेज में कुल खाली पदों संख्या-12525
अधिकारिक वर्ग में खाली पदों की संख्या-2442
निरीक्षकों के खाली पदों की संख्या-399
परिचालकों के खाली पदों की संख्या-1575
चालकों के कुल खाली पदों की संख्या-355
तकनीकी वर्ग में खाली पदों की संख्या-3697
खाली पद भरे तो फिर सुधरेगी रोडवेज की सेहत

बसों के शिड्यूल तक निरस्त हो जाते हैं
चालकों की ड्यूटी बस चालन में लगनी चाहिए, लेकिन उनके वर्कशॉप सरीखी तकनीकी जगहों पर काम करने का सीधा असर रोडवेज की पूरी व्यवस्थाओं पर पड़ा है। बसों के मरम्मत की जिम्मेदारी मिस्त्री पर रहती है, लेकिन यहां पर मिस्त्रियों के पदों के खाली होने की वजह से कई जगहों पर चालकों एवं परिचालकों को यह जिम्मेदारी भी निभानी पड़ रही है। जानकारों की माने तो सीकर, कोटा, उदयपुर, जोधपुर, जैसलमेर, श्रीगंगानगर, सवाईमाधोपुर, प्रतापगढ़, सिरोही एवं राजधानी जयपुर में भी रोडवेज संघर्ष कर रहा है। इसके चलते कई बार बसों के शिड्यूल तक निरस्त करने पड़ रहे हैं।
इनका कहना है...
रोडवेज में खाली पदों का प्रस्ताव पूर्व में भेजा चुका है। आवश्यकतानुसार इसको नए सिरे से भी भेज दिया जाएगा। अभी तो सरकार ने कार्ययोजना मांगी है, लेकिन उम्मीद है कि रोडवेज के लिए बेहतर काम होने की पूरी उम्मीद है।
नथमल डिडेल, प्रबन्ध निदेशक, राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम

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